पहले नवरात्र पर भक्तों ने मां के शैलपुत्री रूप की पूजा-अर्चना की। श्रद्धालुओं ने व्रत रखकर मां से सौभाग्य और लंबी आयु की कामना की। घर पर पूजा के साथ ही माता के मंदिरों में भक्तों की भीड़ रही। दोपहर में और शाम को महिलाओं ने माता के छंद गाए।
चैत्र नवरात्र के प्रथम दिन शनिवार को भक्तों ने देवी मां के शैलपुत्री स्वरूप का पूजन किया। सुबह से ही मंदिरों के पट खुलते ही भक्तों की कतार लग गई। शंख, घंटे-घडिय़ाल की ध्वनि के बीच मां के जयकारे लगाते हुए भक्तों ने मां को पुष्प, नारियल, श्रृंगार सामग्री, लौंग, फल चढ़ाकर कपूर की बाती से पूजा-अर्चना की। माता की आरती व दुर्गा चालीसा का पाठ किया।
पंडित संतोष शर्मा बताते हैं कि राजा दक्ष प्रजापति की पुत्री के रूप में जन्म लेने वाली देवी सती का दूसरा स्वरूप पार्वती या शैलपुत्री का है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण मां के प्रथम स्वरूप का नाम शैलपुत्री पड़ा। देवी सती के राजा दक्ष के यज्ञाग्नि में आत्मोत्सर्ग करने के बाद भगवान शिव ने तांडव किया था। इसके बाद मां ने शैलपुत्री रूप में अवतार लिया। मां शैलपुत्री से कठोर तप के बाद भगवान शिव का विवाह हुआ।
नगर में प्राचीन श्री दुर्गा शक्तिपीठ मंदिर सिविल लाइंस, माई का थान, मंदिर वाली गली, हरिहर मंदिर, मनोकामना मंदिर समेत समस्त देवी मंदिरों में पूरे दिन भक्तों की भीड़ लगी रही। देवी भक्तों ने फलाहार कर दिन व्यतीत किया। इसके साथ ही माता के भजन गाए और कीर्तन किया। भक्तों ने कन्याओं से आशीर्वाद लिया। कई साधकों ने घर पर पूजा-अर्चना कर अज्ञारी की और दुर्गा सप्तसती का पाठ भी किया।