रामपुर। नवाबों के शहर रामपुर में आज भी गली मोहल्लों से लेकर शैक्षिक संस्थानों के नाम कई नवाबों और उनके परिजनों के नाम पर हैं। यहां के मोहल्लों के नामों का भी एक इतिहास है। ऐसा ही एक मोहल्ला है हाथीखाना। नवाबों की सेना के बेड़े में कई हाथी थे। हाथियों के रहने के लिए हाथीखाना बसाया गया था। बाद में पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को यहां बसाया गया। तब से इस मोहल्ले का नाम हाथीखाना पड़ गया। रामपुर में पहले राजा राम सिंह कठेरिया का राज था। इसके बाद यहां नवाबों का राज स्थापित हुआ। रामपुर के नवाबों ने शहर को अपने हिसाब से बसाया। नवाबों ने अपने नाम से शैक्षिक संस्थान भी खोले तो तमाम ऐतिहासिक इमारतों को धरोहर के रूप में संजोया। रामपुर की ऐतिहासिक रजा लाइब्रेरी नवाबों की ही देन है। इतिहासकार बताते हैं कि रामपुर शहर बसने के बाद यहां के मोहल्लों का भी अपना इतिहास रहा है। शहर के मोहल्लों का इतिहास भी नवाबों से जुड़ा हुआ है। शहर के तमाम मोहल्ले आज भी उसी नाम से जाने जाते हैं। नामों को बदलने की कोशिश जरूर हुई, लेकिन लोगों की जुबां पर आज भी वही पुराने नाम हैं।
शहर के बीचों बीच बसा हाथीखाना मोहल्ला नवाब हामिद अली खां और फिर नवाब रजा अली खां के समय में बसाया गया। इतिहासकार महेंद्र सक्सेना बताते हैं कि नवाब हामिद अली खां के समय नवाबी सेना शान से चलती थी। उनकी सेना में कई हाथी थे। ये हाथी नवाब रजा अली खां के समय भी रहे। हाथियों के रहने की व्यवस्था शाहबाद गेट से शहर कोतवाली वाले मार्ग पर की गई थी। यहां एक बाड़े में हाथियों को रखा जाता था। हाथियों की देखभाल के लिए तमाम कर्मचारी लगाए गए थे। आजादी के बाद पाकिस्तान से तमाम शरणार्थी रामपुर आए थे। नवाब रजा अली खां ने उन्हें यहां रहने के लिए जगह दी। हाथियों के रहने के स्थान के चलते मोहल्ले का नाम हाथीखाना पड़ गया। आज भी यह मोहल्ला हाथीखाना के नाम से जाना जाता है।
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- हाथीखाना में नवाब की सेना के हाथी बांधे जाते थे। इनकी देखभाल के लिए सेना के लोग भी रहा करते थे। बाद में शरणार्थी आ गए और यहां बस गए। अब यही हाथीखाना नाम से मोहल्ला बस गया।
महेंद्र सक्सेना, इतिहासकार
ओंकार सिंह, संवाद।
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