रामपुर। देश की आजादी के बाद जहां एक और भारत से कटकर पाकिस्तान अलग मुल्क बना तो वहीं देश में तमाम रियासतों का विलय भी भारत में किया गया। रामपुर की रियासत भी आजाद भारत में विलय हुई और इसी समय रामपुर में रखी गई गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा के निर्माण की नींव। शुगर मिल से टीन की चादर लाकर एक छोटे से हिस्से से शुरू हुए गुरुद्वारे के सफर में आज करीब 70 साल पूरे हो चुके हैं।
सिविल लाइंस में रेलवे स्टेशन के सामने से जा रही गुरुद्वारा रोड पर ही बने गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा शहर के सबसे पुराने गुरुद्वारों में से एक गुरुद्वारा है। करीब 70 साल का सफर तय कर चुके इस गुरुद्वारे की शुरुआत एक छोटे से स्थान पर शुगर फैक्टरी से टीन की चादर लाकर की गई। भारत की आजादी के बाद पाकिस्तान को अलग देश बना दिया गया और उस वक्त बड़ी संख्या में सिख समाज के लोग पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए। यही वो दौर था जब देश की आजादी के बाद रियासतों के विलयीकरण का सिलसिला शुरू हो चुका था।
गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के महासचिव मनमीत सिंह मित्ते बताते हैं कि भारत-पाकिस्तान के अलग-अलग होने के बाद रामपुर रियासत का केंद्र सरकार के अधीन विलय हो गया। इसके बाद रामपुर में गंगा सिंह चूरामणि को साल 1949 में रामपुर के पहले जिलाधिकारी के रूप में तैनाती दी गई। गंगा सिंह चूरामणि रामपुर में साल 1952 तक जिलाधिकारी के रूप में तैनात रहे, इसी दौरान उनके शुरुआती कार्यकाल में ही ध्यान सिंह रामगढ़िया वाले और निरंजन सिंह ने गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा के निर्माण के लिए जिलाधिकारी गंगा सिंह चूरामणि से जमीन का आवंटन कराया और शुगर फैक्टरी से एक टीन की चादर लाकर डाली गई। इसके बाद धीरे-धीरे गुरुद्वारे से संगत जुड़ती गई और आज गुरुद्वारा विशाल भव्य रूप में है।
गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के प्रधान निर्मल सिंह बताते हैं कि शुरुआत में गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन नहीं किया गया। करीब 50-55 साल पहले गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन किया गया और अवतार सिंह कंधारी प्रबंधक कमेटी के पहले प्रधान बने। इसके बाद दर्शन सिंह कंधारी, चनन सिंह, इंद्रजीत सिंह चिटकारा, राजेंद्र वादी प्रबंधक कमेटी के प्रधान रहे लेकिन, पिछले 50 साल में प्रबंधक कमेटी को लेकर कभी भी चुनाव नहीं हुआ। अब तक प्रबंधक कमेटी का गठन सर्वसम्मति से ही होता आया है।
गुरुद्वारे के ग्रंथी ज्ञानी सुरजीत सिंह जी बताते हैं कि पहले उनके पिता इस गुरुद्वारे में ग्रंथी थे और अब वो सेवा कर रहे हैं। गुरुद्वारे में वैशाखी का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है और अमृत संचार की परंपरा भी यहां पर इसी गुरुद्वारे से की गई। यह गुरुद्वारा अकाल तख्त अमृतसर से संबद्ध है और वहां से सभी निर्देश इस गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को प्राप्त होते हैं जो कि सभी संगत को यहीं से बताए जाते हैं। गुरुद्वारे निर्माण के शुरुआती वर्षों में जब नैनीताल मार्ग पर यातायात इतना सुगम नहीं था तब रामपुर में दूर-दराज से ट्रेन-बस से आने वाले सिख समाज और अन्य समाज के यात्री इस गुरुद्वारे में ही रुकते थे।