रामपुर। शाहबाद क्षेत्र के ग्राम मोहम्मदपुर उर्फ नया गांव की ग्राम सभा की करीब 106 एकड़ जमीन को निजी नामों में दर्ज कराने का बड़ा खेल सामने आया है। फर्जी कागजों से तहसील रिकॉर्ड में हेरफेर कर जिस जमीन को चार भाइयों और उनकी मां के हक में दर्ज कराया वह सरकारी कागजों में रामगंगा और खादर की भूमि के रूप में दर्ज है। मौजूदा वक्त में इसकी कीमत 16 करोड़ रुपये के आसपास मानी जा रही है।
साल 2010 में हुए इस कारनामे की एक शिकायत से शुरू हुई जांच में परत-दर-परत चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। मामले की सुनवाई करते हुए उप संचालक चकबंदी की कोर्ट ने 16 साल पुराने आदेश को निरस्त कर दिया है। एसओसी की जिम्मेदारी संभाले एडीएम न्यायिक जंग बहादुर यादव ने इस जमीन को फिर ग्राम सभा के खाते में दर्ज करने के आदेश दिए हैं। साथ ही तहसील स्तर पर पूर्व में हुए अवैध इंद्राज की गहराई से जांच करने के निर्देश दिए हैं।
इस खेल में उस दौर के राजस्व और चकबंदी स्टाफ की मिलीभगत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकारी जमीन पर कब्जा कराने के लिए जिन नामों का इस्तेमाल किया गया उनके पते में गांव का नाम मोहम्मद नगर उर्फ नया गांव लिखा गया। जांच के दौरान पूरे शाहबाद तहसील क्षेत्र में इस नाम का कोई गांव ही नहीं है। लिहाजा सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि जब संबंधित गांव का अस्तित्व ही नहीं था तो उसके नाम से खतौनी और अन्य राजस्व दस्तावेज कैसे तैयार हुए और इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर निजी नामों में जमीन के इंद्राज के आदेश कैसे प्राप्त कर लिए गए। कोर्ट ने माना कि नामौजूद गांव के नाम से तैयार दस्तावेजों का इस्तेमाल वास्तविक गांव मौहम्मदपुर उर्फ नया गांव के अभिलेखों में इंद्राज कराने के लिए कथित तौर पर ऐसे गांव का सहारा लिया गया, जिसका राजस्व अभिलेखों में अस्तित्व ही नहीं था।
-
कोटःःः
पूरे मामले की सुनवाई और पुराने दस्तावेजों की जांच के बाद कोर्ट ने छह मार्च 2010 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही उस आदेश के आधार पर किए गए कथित फर्जी इंद्राज और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर दाखिल निगरानी को भी खारिज कर दिया गया। कोर्ट ने विवादित भूमि को फिर से ग्राम सभा के खाते में दर्ज किए जाने का आदेश दिया है।
- जंग बहादुर यादव, उप संचालक चकबंदी एवं एडीएम (न्यायिक)
-
मधुकर गांव के परिवार के नाम जमीन करने के लिए गांव का नाम भी फर्जी बनाया
शाहबाद क्षेत्र में 106 एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जे की जांच कब्जाकर्ताओं के गांव का नाम तक फर्जी निकला है। अधिकारी बताते हैं कि शाहबाद क्षेत्र के गांव मधुकर के रहने वाले चार भाई शिवराज सिंह, ब्रजराज सिंह, अभिनंदन सिंह, हरिराज सिंह और उनकी मां रामवती के नाम इस भूमि का इंद्राज किया गया। इनके गांव का नाम मोहम्मद नगर उर्फ नया गांव लिखा गया जो शाहबाद तहसील क्षेत्र में ही नहीं।
ऐसे हुआ खेल का खुलासा
जमीन के इस पूरे खेल का खुलासा साल 2010 में तब हुआ जब इस भूमि पर खड़े पेड़ों की लकड़ी बिलासपुर के एक ठेकेदार हमसूद खां को बेचने का सौदा हुआ। ठेकेदार मजदूरों के साथ पेड़ काटने मौके पर पहुंचा तो ग्रामीणों ने ग्राम सभा की सरकारी जमीन बताते हुए इसका विरोध किया। मामला बढ़ने के बाद ग्राम सभा की भूमि प्रबंधक समिति के सचिव ने गंभीरता दिखाई। इसके बाद शासकीय अधिवक्ता के माध्यम से अभिलेखागार से संबंधित पुरानी पत्रावलियां निकलवाकर जांच कराई गई। अभिलेखों की पड़ताल में वर्ष 2010 में कब्जाकर्ताओं के हक में पारित आदेश और उस दौरान बरती गई अनियमितताओं की बात सामने आई। इसके बाद ग्राम सभा की ओर से 29 जुलाई 2025 को उप संचालक चकबंदी के कोर्ट में पुनर्स्थापन प्रार्थना पत्र दाखिल कर पुराने आदेश को चुनौती दी गई।
-
निजी नामों में दर्ज नहीं हो सकती नदी या खादर की जमीन
कोर्ट ने वर्ष 1359 फसली के पुराने खसरे की जांच की तो संबंधित गाटा में भूमि को रामगंगा नदी और रेत के रूप में दर्ज पाया। कोर्ट के सामने यह तथ्य भी रखा गया कि नदी, जल स्रोत और सार्वजनिक उपयोग की ऐसी भूमि पर निजी भूमिधरी अधिकार दिए जाने का सवाल ही नहीं उठता। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के विभिन्न आदेशों में भी जल स्रोतों, नदी और सार्वजनिक उपयोग की सुरक्षित भूमि के संरक्षण पर जोर दिया गया है। इसके बावजूद ऐसी भूमि को निजी अधिकार से जोड़ने वाले दस्तावेज सामने आने पर कोर्ट ने पूरे मामले की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए।
1370 फसली की खतौनी भी संदेह के घेरे में
वादी पक्ष की ओर से वर्ष 1370 फसली की एक खतौनी भी कोर्ट के सामने पेश की गई। कोर्ट ने जब इस दस्तावेज को देखा तो वह अस्पष्ट और अपठनीय मिला। कोर्ट ने इसे भी संदिग्ध मानते हुए इसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। मूल अभिलेखों और प्रस्तुत दस्तावेजों के बीच अंतर ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया। अदालत ने दस्तावेजों की प्रकृति, गांव के अस्तित्व और पुराने राजस्व अभिलेखों की स्थिति को देखते हुए माना कि विवादित जमीन के संबंध में कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर अधिकार हासिल करने का प्रयास किया गया।
हाईकोर्ट के आदेश को भी नजरअंदाज करने का आरोप
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट से जुड़े रिकॉर्ड भी न्यायालय के सामने आए। कोर्ट के मुताबिक, निगरानीकर्ताओं ने हाईकोर्ट के सामने भी पूरे तथ्यों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं किया। 2011 में हाईकोर्ट की ओर से रिकॉल आदेश जारी किया गया था। इसके बावजूद राजस्व अधिकारियों को गुमराह कर 15 मार्च 2014 को दोबारा परवाना अमलदरामद जारी करा दिए जाने की बात सामने आई। यानी एक ओर हाईकोर्ट का आदेश मौजूद था, वहीं दूसरी ओर उसके बाद भी संबंधित राजस्व अभिलेखों में बदलाव की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। अदालत ने इस पहलू को भी गंभीर माना है।