रायबरेली में शुक्रवार की देर शाम आईटीआई के आफीसर्स क्लब में हुए जश्न ए अदब साहित्योत्सव कार्यक्रम के दौरान मौजूद साहित्यकार व अन्य।
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जश्न-ए-अदब की ओर से आईटीआई के ऑफीसर्स क्लब में इंटरनेशनल पोएट्री फेस्टिवल (साहित्योत्सव) के तहत हिंदी और उर्दू एक मुश्तरका तहजीब विषय पर आयोजित परिचर्चा में पाकिस्तान से आईं महिलाओं के हक में आवाज उठाने वाली शायरा किश्वर नाहीद ने कहा कि एक समय था जब हम सभी त्योहार मिलजुल कर एक साथ मनाते थे। आज ऐसा नहीं है।
हमें हिंदुस्तान की किताबें और मुहब्बत चाहिए, जब किताबें नहीं पहुंचती तो मुहब्बत कहां पहुंचेगी। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने एटम बम बनाए, अगर विकास के साधन बनाते तो बहुत अच्छा होता। हिंदी और उर्दू जुबान इस कदर मिले हैं कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है।
पद्मश्री अशोक चक्रधर ने कहा कि अब जब हम सांस्कृतिक विरासत को जी रहे हैं, तो भाषा को मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। हिंदुस्तान-पाकिस्तान का झगड़ा सियासतदारों की देन है। यह मसला साहित्यकारों को सौंप दें। वे उसे हल कर लेंगे।
उन्होंने कहा कि भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत पड़ोसी देशों में आने-जाने के लिए पासपोर्ट वीजा नहीं होना चाहिए। जश्न-ए-अदब अध्यक्ष आईपीएस कैसर खालिद ने कहा कि जब मोहब्बत हो तो दूरी मायने नहीं रखती। साहित्य जोड़ने का काम करता है। संचालन जश्न-ए-अदब के सचिव कुंवर रंजीत चौहान ने किया।