दिवाली के बाद रविवार को भी जिले की आबोहवा खराब रही। वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर बना रहा। दिनभर स्मॉग की चादर पसरी रही। सामान्य दिनों में वायु में आरएसपीएम (रीस्पाइरेबल सस्पेंडेड पर्टिकुलेट मैटर) की संख्या 100 होती है जो रविवार को बढ़कर 200 के पार पहुंच गयी।
मौसम में अचानक हुए इस परिवर्तन से लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। पिछले कई दिनों से दिन में तेज धूप तो सुबह और रात में सर्दी होती थी। लोगों की आंख खुलते ही सूरज की तेज चमक के दर्शन होते थे। रविवार की सुबह जब लोग सोकर उठे तो मौसम बदला बदला नजर आया।
न तो सूरज दिख रहा था और न ही सर्दी का एहसास हुआ। हर तरफ सिर्फ धुंध ही दिखी। इसको लेकर लोगों में तरह-तरह की चर्चाएं रही। कोई इसे कोहरा बता रहा था तो कोई बदली का असर कह रहा था।
सबसे ज्यादा परेशानी तो मुसाफिरों को हुई। लोगों को अपने-अपने वाहनों की लाइट जलाकर सफर करना पड़ा। हालात यह थे कि लाइट जलाने के बाद भी लोगों को रास्ता नहीं दिख रहा था। बाद में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अफसरों ने स्पष्ट किया कि दिल्ली में फैले वायु प्रदूषण के कारण ऐसा हुआ।
लखनऊ के बाद स्मॉग रायबरेली भी पहुंच गया। वायु में आरएसपीएम की संख्या 100 निधार्रित है, लेकिन धुंध के कारण यह दोगुनी से भी अधिक हो गई। जानकारों का कहना है कि दिल्ली में जो हालात है, उसकी वजह दिवाली में हुई अधिक आतिशबाजी है।
दिवाली के बाद से ही वहां पर पर्यावरण का संतुलन बिगड़ा और स्मॉग ने पैर पसार लिए। यही नहीं फसल के बचे अवशेषों में खेतों में ही जलाए जाने का भी असर रहा। इससे हुए धुंए ने आग में घी का काम किया। इसकी वजह से धुंध फैल गई।
इसके कारण वायु में घुलनशील सूक्ष्म कणों की संख्या बढ़ गई, जिससे लोगों को शुद्ध हवा नसीब नहीं हो रही है। जिला अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. बीरबल का कहना है कि स्मॉग प्रदूषण सांस रोगियों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
इससे गला खराब होने और श्वांस का अटैक पड़ने का खतरा रहता है। ऐसे में इन रोगियों को सावधानी बरतने की जरूरत है। गला खराब होने पर नमक पानी का गरारा करना चाहिए। वहीं श्वांस का अटैक पड़ने पर तत्काल नजदीकी अस्पताल में चिकित्सक की सलाह लें। जरा की असावधानी रोगी की जान को खतरे में डाल सकती है।