इस दौरान महिलाएं छठ पूजा के लिए पूरे दिन व्यस्त रहीं। बाजार में व्रतधारी महिलाओं ने सूप डाला, फल और पूजन सामग्री की खरीदारी की।
पूर्वांचल का प्रमुख पूजा डाला छठ को लेकर जिले में भी तैयारी जोर-शोर से चल रही है। यहां पर करीब तीन हजार परिवार है।
आईटीआई, कल्लू का पुरवा, शक्तिनगर, कृष्णा नगर, गांधी नगर, सोनिया नगर, रेलवे कॉलोनी आदि मोहल्लों में सबसे अधिक संख्या है। सुख-समृद्धि के लिए सूर्य देव की कठिन पूजा के लिए तैयारियां देर रात तक चलती रहीं।
व्रत में शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है। इसलिए पूजा प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे की लकड़ी से लेकर बर्तन सभी को गंगाजल से पवित्र किया गया।
पीतल के बर्तन में पूजन सामग्री बनाई गई। दिन भर व्रत करने के बाद शाम को लौकी या कद्दू की सब्जी और चावल का प्रसाद छका। इस दौरान महिलाओं ने बाजार में फल, पूजन सामग्री और चढ़ाने के लिए साड़ी की खरीदारी की।
राजवती, मधू सिंह ने बताया कि छठ पूजा में नई साड़ी पहनकर पूजा की जाती है। इसके साथ ही महिलाओं ने चावल, गुड़, सब्जियां, फल, शुद्ध देशी घी, दूध और सुहाग शृंगार का सामान आदि की खरीदारी की।
सूर्य षष्टी व्रत की असली शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी खरना से मानी जाती है। सोमवार को व्रती महिला खरना का व्रत करेंगी। पूरे दिन निर्जला रहकर घर में पूजा स्थल वाले कमरे में पूड़ी और मीठा चावल बनाएंगी।
शाम को पूजा-अर्चना के बाद प्रसाद और जल ग्रहण करेंगी। व्रत के तीसरे दिन डाला छठ मंगलवार को डूबते और बुधवार को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
व्रती महिलाएं षष्टी को निर्जला व्रत रह कर नदी में कमर तक पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देंगी। सप्तमी की सुबह को उगते सूरज को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण होगा।
सायंकाल प्रथम अर्घ्य में परंपरा के अनुसार महिलाएं सूर्यास्त के समय पहले से बनाए गए सिप-सोप्ता (मिट्टी से बनाया गया मंदिरनुमा गुंबद) की पूजा अर्चना कर पांच बार परिक्रमा करती हैं।
नए कपड़े, नया सुहाग शृंगार कर ठेकुआ चढ़ाया जाता है। गन्ना, कच्ची हल्दी गागरा, फल आदि पूजा के लिए एकत्र किए सामान से पूजा-अर्चना की जाएगी। इसी तरह सूर्योदय के समय अर्घ्य देकर सूर्य की पूजा की जाती है।