रायबरेली। जिले में बिना परमिट व फिटनेस के 350 से अधिक वैन, टेंपो व मैजिक वाहनों से स्कूली बच्चों को ढोया जा रहा है। इन अनफिट स्कूली वाहनों के कारण रोजाना बच्चों की जान पर खतरा बना रहता है।
गाजियाबाद में हुई लापरवाही के कारण हुई घटना के बाद भी स्कूल संचालक सबक नहीं सीख रहे हैं। वहीं परिवहन विभाग के अफसर किसी अनहोनी कर इंतजार कर रहे हैं।
कुछ दिनाें पहले ही गाजियाबाद में स्कूल बस की खिड़की से बाहर झांकते समय मासूम का सिर खंभे से टकरा गया था। हादसे में उसकी मौत हो गई थी। बस में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण यह हादसा हुआ।
जिले के स्कूली वाहनों में भी मानकों से खिलवाड़ किया जा रहा है। करीब सात सौ छोटे-बड़े स्कूली वाहन एआरटीओ में पंजीकृत हैं। इसके अलावा 200 से अधिक मैजिक, टेंपो, वैन आदि छोटे वाहनों से भी बच्चों को ढोया जा रहा है। इन वाहनों में सुरक्षा के कोई बंदोबस्त नहीं हैं।
कई छोटे वाहन तो अवैध रूप से सीएनजी से संचालित किए जा रहे हैं। पूर्व में स्कूली वैन में आग लगने की घटनाएं भी हो चुकी हैं। फिर भी कोई सबक लेने को तैयार नहीं है।
जिले में 750 स्कूली वाहनों में 150 से अधिक वाहन अनफिट हैं। इसके बाद भी इनसे बच्चों को ढोया जा रहा है। परिवहन विभाग के अधिकारी महज औपचारिकता निभाने में जुटे हैं।
स्कूलों में लगीं निजी बसों की खिड़कियों में ग्रिल नहीं
स्कूलों में लगीं निजी बसों की खिड़कियों पर लोहे की ग्रिल नहीं हैं। इसी खामी के कारण गाजियाबाद में बड़ा हादसा हो गया है। हालांकि घटना के बाद परिवहन विभाग के अफसरों ने अभियान शुरू कर दिया है। कई स्कूली वाहनों पर कार्रवाई भी की गई है।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार, स्कूली बस या अन्य वाहन पीले रंग से पेंट होनी चाहिए। साथ ही बस के आगे व पीछे ऑन स्कूल ड्यूटी लिखा हो। सभी खिड़कियों के बाहर लोहे की ग्रिल होनी चाहिए। बस में अग्निशमन यंत्र लगा हो, जिससे आग लगने की स्थिति में तत्काल उस पर काबू पाया जा सके।
स्कूल बस के पीछे स्कूल का नाम और फोन नंबर लिखा होना चाहिए। दरवाजे में ताला लगा हो और सीटों के बीच पर्याप्त जगह होनी चाहिए। इसके अलावा चालक को कम से कम पांच साल का वाहन चलाने का अनुभव हो। ड्राइवर के पास लाइसेंस और ट्रांसपोर्ट परमिट होना चाहिए।
अभिभावक रखें इन बातों का ध्यान
स्कूल बस में अपने बच्चों को बैठाते वक्त अभिभावक को भी कुछ अहम बातों का ध्यान रखना चाहिए। बस खड़ी होने पर ही बच्चों को चढ़ाएं। इसके अलावा बस ड्राइवर की हरकतों पर नजर रखें। सबसे अहम बात यह है कि इसका बात का ध्यान रखें कि कहीं ड्राइवर नशे में तो नहीं है।
बस में हेल्पर के साथ स्कूल की ओर से एक जिम्मेदार शख्स की तैनाती करनी होती है, जिसकी बच्चों को बस में चढ़ाते और उतारते वक्त अहम जिम्मेदारी होती है। अगर यह जिम्मेदार बस में नहीं है तो अभिभावकों को इसकी शिकायत स्कूल प्रबंधन से करनी चाहिए।
जिले के स्कूलों में करीब 750 वाहन हैं। बसों व अन्य छोटे स्कूली वाहनों की चेकिंग शुरू कर दी गई है। बड़े स्कूलों के वाहनों को चेक किया जा चुका है। अब ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूली वाहनों की जांच शुरू की गई है। मानकों के विपरीत मिल रहे वाहनों पर कार्रवाई की जा रही है।
मनोज कुमार सिंह, एआरटीओ (प्रवर्तन)