रायबरेली। कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) दरियापुर की ओर से शनिवार को प्रियदर्शनी पब्लिक स्कूल भदोखर, न्यू आदर्श पब्लिक स्कूल सुलखियापुर, स्व. बृजरानी इंटरमीडिएट काॅलेज सवनई चौराहा, बेलागुसीसी तथा सत्यनरायण इंटर काॅलेज दरियापुर में फसल अवशेष प्रबंधन पर जागरूकता कार्यक्रम हुए। इसमें बच्चों को फसल अवशेष प्रबंधन की जानकारी दी गई। इस मौके पर आयोजित निबंध प्रतियोगिता में नव्या त्रिवेदी, दिव्या, रिचा यादव, अपूर्वा द्विवेदी ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।
अंशिका, आयुषी यादव, सौरभ कुमार, रागनी दूसरे व प्राची, नैंसी यादव, अंशिका मौर्या, सुनैना ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। विजयी प्रतिभागियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में केवीके के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. केके सिंह ने बच्चों को बताया कि पराली समस्या नहीं है, बल्कि इसका समाधान किया जा सकता है। उन्होंने बच्चों से कहा कि वे पराली प्रबंधन के विषय में अपने अभिभावकों एवं गांव के अन्य किसानों को प्रबंधन के बारे में जानकारी दें।
योजना के नोडल अधिकारी डाॅ. दीपक मिश्रा ने बताया कि पराली को जलाने से पर्यावरण प्रदूषित होता है, मिट्टी सक्त होती है तथा मिट्टी में मौजूद लाभकारी कवक, जीवाणु एवं मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं। यदि इसी पराली को पूसा डिकंपोजर को 150 लीटर पानी में मिलाकर डेढ बीघा में छिड़काव करने से अवशेष एक महीने में गलकर जैविक खाद के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसे मिट्टी में मिलाकर उर्वराशक्ति को बढ़ाया जा सकता है।
वैज्ञानिक डाॅ. एसवी सिंह ने बच्चों को बताया कि फलों तथा सब्जियों की खेती में फसल अवशेष को मलचिंग के रूप में लाया जा सकता है। इससे खरपतवार नियंत्रण तथा पानी की बचत होती है। बताया कि वे पराली प्रबंधन करके कृषि लागत को घटा सकते हैं। डॉ. आरके कनौजिया ने बताया कि धान की देर से कटाई होने के कारण गेहूं की बोआई के लिए समय कम मिलता है। इस लिए शीघ्र बोआई के लिए कंबाइन से कटे हुए खेतों में पूसा डिकंपोजर का छिड़काव करने के बाद सुपर सीडर के प्रयोग से गेहूं की सीधी बोआई कर सकते हैं।