सत्ता की जंग हर मैदान में नहीं लड़ी जाती। चुनावी महारथी खास मैदानों पर ही उतरते हैं। रैलियों से रंग जमाने के लिए। ये ऐसे मैदान हैं, जिनमें सियासत के सूरमाओं का मुकद्दर बना भी है और बिगड़ा भी है। मैदान भर जाएं तो हवा चल पड़ती है और वोट बरस जाते हैं। मैदान खाली रह जाएं तो हवा बिगड़ जाती है।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र में भी हर चुनाव में ऐसे ही दमखम मैदान पर दिखाया जाता है। ये बात दीगर है कि यह दमखम अक्सर हकीकत में नहीं बदल पाया। किसी को जीत मिली तो किसी को हार। हार मिले ये जीत, पर मैदान में भीड़ जुटाकर ताकत दिखाना हर पार्टी के महारथियों की फितरत में शामिल रहा है।
एक बार फिर विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। वोटरों को अपने पाले में करने के लिए पार्टी नेता रैली के जरिए ताकत दिखाने का प्लान तैयार कर रहे हैं। वैसे रायबरेली जिले की बात की जाए तो यहां पर शहर के राजकीय इंटर कॉलेज का मैदान या फिर जिला अस्पताल चौराहा स्थित रिफार्म क्लब का मैदान हैं, जहां पर चुनाव के दौरान रैली या फिर बैठक की जाती है। रिफार्म क्लब का मैदान छोटा होने के नाते अक्सर यहां पर छोटी रैली या फिर बैठक हो जाती है।
पर राजकीय इंटर कॉलेज मैदान में प्रमुख दलों भाजपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा की ओर से बड़ी रैलियों का आयोजन किया जाता है।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और भाजपा नेता उमा भारती जैसे दिग्गज यहां पर रैली के जरिए अपनी ताकत दिखा चुके हैं। यहीं से ताकत दिखाते हुए इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री तक की कुर्सी का सफर तय किया था।
हालांकि इंदिरा गांधी के समय में राजकीय इंटर कॉलेज के बजाय एफजी कॉलेज स्थित मैदान में रैलियों का आयोजन होता था। इधर, दो से तीन दशक से इसकी जगह बस स्टेशन रोड स्थित राजकीय इंटर कॉलेज के मैदान ने ले ली है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव भी अछूते नहीं रहे। उन्होंने भी जीआईसी में रैली के जरिए विरोधियों को अपनी ताकत दिखा चुके हैं।
तब एक लाख लोगों की जुटी थी भीड़
तब के समय में भी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की रैली में एक लाख की भीड़ जुटती थी। यह देख विरोधियों के हौसले पस्त हो जाते थे। समाजसेवी जगदीश शुक्ल कहते हैं कि 1967 में वह दिन आज भी याद है। पहले एफजी कॉलेज के मैदान में रैलियां हुआ करती थीं।
इंदिरा गांधी की रैली थी। तब के समय में भी एक लाख भीड़ जुटी थी। मैदान इस कदर भर गया था कि बैठने के लिए जगह नहीं थी। इंदिरा गांधी के मंच पर पहुंचने से पहले मैदान खचाखच भर गया था। तब का वह समय था। अब तो पहले से ज्यादा भीड़ जुटाई जाती है। राजीव गांधी की रैली में भी इसी तरह की भीड़ दिखती थी। यह भीड़ वोट में भी तब्दील होती थी।
वर्ष 2007 में कांग्रेस तो 2012 में सपा की काम आई ताकत
मैदान पर रैलियां करके ताकत तो दिखाई जाती है, लेकिन यह कम ही हो पाया है कि वोटों में तब्दील हो पाए। जिले के लिहाज से वर्ष 2012 का विधानसभा चुनाव लीजिए। वर्ष 2007 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने रैली करके ताकत का एहसास कराया तो छह विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा हो गया।
वर्ष 2007 में सपा मुखिया मुलायम सिंह भी यहां पर रैली की थी। हालांकि वर्ष 2012 में सोनिया व प्रियंका वाड्रा ने भी रैली की, लेकिन यह बड़ी रैली वोट में तब्दील नहीं हो पाई। ऐसे में पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया। वहीं सपा नेताओं की ताकत काम आई। भाजपा तो खाता भी नहीं खोल पाई।
जिले का सबसे यादगार पल 1977 का चुनाव
सिर्फ रायबरेली ही नहीं, बल्कि 1977 का लोकसभा चुनाव पूरे देशभर के लिए आज भी यादगार है। इस चुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हार मिली थी, जबकि राजनारायण के सिर जीत का सेहरा बंधा था।
आज जब चुनाव के दिनों की याद आती है तो विरोधी पार्टियों के सूरमा इस तारीख का जरूर कटाक्ष करके हमला बोलते हैं। सिर्फ सूरमाओं ने ही नहीं, बल्कि यहां के लोग भी इस बात को अभी नहीं भूले हैं। इसे सबसे यादगर चुनाव माना जाता है। इंदिरा गांधी ने रैली भी की थी, लेकिन कामयाबी हाथ नहीं लग पाई थी।