रायबरेली। इन दिनों पड़ रहा घना काेहरा आलू की फसल के लिए घातक हो सकता है। ऐसे में वे किसान ज्यादा सतर्क रहें जिन्होंने आलू की पिछेती बोआई की है। आलू की पिछेती फसल में झुलसा बहुत गंभीर बीमारी है, जो सर्दी और कोहरे में तेजी से फैलती है। दिसंबर और जनवरी के महीने में तापमान में गिरावट के कारण इस रोग के प्रकोप की आशंका ज्यादा बढ़ जाती है। रोग से बचने के लिए किसान समय से दवाओं का छिड़काव करें।
इस साल करीब छह हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की बोआई की गई है। सलोन, डीह, छतोह क्षेत्र के किसान सबसे ज्यादा आलू का उत्पादन करते हैं। जिला उद्यान अधिकारी जेआर वर्मा ने इस रोग के लक्षण एवं प्रबंधन के लिए किसानों को महत्वपूर्ण सलाह दी है। उन्होंने बताया कि सही समय पर प्रबंधन न करने पर आलू की फसल को भारी नुकसान हो सकता है।
उन्होंने कहा कि झुलसा रोग लगने पर सबसे पहले पत्तियों के किनारों व ऊपरी भाग में पानी जैसे धब्बे दिखाई देते हैं, ये धब्बे तेजी से बढ़ते हैं और बाद में भूरे काले रंग के हो जाते हैं। पत्तियों की निचली सतह पर सफेद फफूंदीनुमा परत जम जाती है। रोग के अधिक प्रकोप होने पर आलू के कंदों पर काले धब्बे दिखाई देते हैं। इससे उत्पादन पर असर पड़ता है।
कृषि विज्ञान केंद्र द्वितीय के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. विश्व विजय रघुवंशी ने बताया कि शुरुआती दौर में झुलसा रोग लगने पर मैंकोजेब 75 प्रतिशत 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी या क्लोरोथेलोनिल 75 प्रतिशत दो ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। रोग के अधिक लक्षण दिखाई देने पर मेटलैक्सिल आठ प्रतिशत, मैंकोजेब या डाईमेथोमॉर्फ 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।
उन्होंने बताया कि रोग को फैलने से रोकने के लिए फसल की सिंचाई करें और खेत में पानी न रुकने दें। संक्रमित पौधों को उखाड़कर नष्ट करें। उन्होंने बताया कि किसी भी दवा का छिड़काव करते समय साफ पानी का प्रयोग करें। सुबह या शाम के समय ही सावधानी से छिड़काव करें।