धान लगाए रहेन तो सिंचाई के बिना यहव फसल बर्बादि होई गए। खरीद से अनाज खाए परत है। घर का खर्चा चलावै की तईं दूसरे की मजूरी करैक पड़ रहा है।
सिंचाई की कउनों व्यवस्था नहिन हैं, अब तो खेती करय कै हिम्मत नहीं होत है। सरकारी सहायता कौन मिली नाहिन। सरेनी विकासकंड क्षेत्र के चकमनिया गांव का किसान मोती लाल जब सूखे पड़े खेत में बैठ कर अपनी पीड़ा सुना रहा था तो उसकी आंखें नम हो गई।
सूखे की जद में आए जिले में यह दर्द सिर्फ एक मोतीलाल का ही नहीं, बल्कि लाखों किसानों का है। पहले ओलावृष्टि और बेमौसम बरसात के चलते गेहूं की फसल खेतों में पड़े-पड़े सड़ गई।
इसके बाद सूखा पड़ने से धान का उत्पादन भी नहीं हुआ। मध्यम और निमभन स्तर से किसानों पर तो मानो गाज ही गिर पड़ी। हालात ने अन्नदाताओं को मजदूर बना दिया।
खाने को लाले पड़े हैं। पहले जहां खाने भर का अनाज पैदा हो जाता था, वहीं इस बार खरीद कर खाना पड़ रहा है। यही नहीं दूसरे की मजदूरी तक के लिए किसान मजबूर हो रहे हैं।
वजह सिंचाई की समस्या है। ऐसे में मजदूरी करना मजबूरी है। हालात यह हैं कि जिले की 251 नहरों, माइनरों, रजबहों में सिल्ट जमा है। इसकी चलते किसानों पानी नहीं मिल रहा है।
वहीं 380 नलकूपों में करीब 35 तो पूरी तरह से बंद है। शेष बचे नलकूपों में कभी ऑपरेटर की लापरवाही से नहीं चलते तो कभी तकनीकी खराबी से बंद पड़े रहते हैं।
ओलावृष्टि और सूखे की मार झेल रहे किसान निजी नलकूपों से किराए पर पानी लेकर गेहूं की बोआई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
जिले को सूखा ग्रस्त घोषित किए जाने के बाद अन्नदाताओं में शासन से काफी मदद की उम्मीद जाग उठी थी। जिले से 22-23 फीसदी फसलों के नुकसान की रिपोर्ट भेजे जाने से किसानों को राहत की उम्मीद भी अब धूमिल हो गई है।