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34 लाख आबादी ने कभी नहीं देखी ऐसी बेबसी व लाचारी

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मरीज को भर्ती कराने के इंतजार में बैठी महिलाएं। - फोटो : RAIBARAILY
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रायबरेली। जिले की 34 लाख आबादी ने कभी ऐसी बेबसी और लाचारी नहीं देखी। अस्पताल से लेकर श्मशान घाट तक पहुंचने वाले लोगों में दहशत और भय दिख रहा है। ऑक्सीजन के साथ ही अस्पतालों में बेड की कमी है।
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लोग जान बचाने के लिए मास्क और सैनिटाइजर का प्रयोग कर रहे हैं। वहीं कोरोना का कहर कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा है। अप्रैल माह के महज 25 दिन में 117 लोग जान गंवा बैठे हैं। रेल कोच फैक्टरी के एल-टू अस्पताल में कोरोना से अधिक जानें गईं हैं।
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि सभी की जागरूकता और सतर्कता से ही हम कोरोना के खिलाफ जंग जीतेंगे। इसलिए जरूरी है कि घर से निकलने पर लोग मास्क पहनें। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल रखें। साथ ही सैनिटाइजर का भी प्रयोग करते रहे।
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एल-टू अस्पताल बना मौत का कब्रगाह
स्वास्थ्य विभाग की नाकामी की वजह से एल-टू अस्पताल कब्रगाह बन गया है। हालात यह हैं कि एल-टू अस्पताल में मरीज इलाज कराना नहीं जाना चाहते हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि एक अप्रैल से 25 अप्रैल तक जिले में कोरोना से 117 लोगों ने जान गंवाई है। इसमें से 95 मौतें एल-टू अस्पपताल में हुईं हैं, जबकि 22 मौतें जिला अस्पताल और होम आइसोलेशन में हुईं हैं।
इस बार मौत का ग्राफ ज्यादा
पिछले साल की दफा इस बार कोरोना से मौत का ग्राफ ज्यादा है। हर दिन मौत का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। पिछले साल कोरोना से पूरे साल में कोरोना से 81 लोगों ने जान गंवाई थी। इस बार महज 25 अप्रैल में ही मौत का आंकड़ा सैकड़ा पार कर गया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिले में कोरोना किस तरह जिंदगी पर भारी पड़ रहा है।
बेड नहीं मिला, तड़पता रहा मरीज
जिला अस्पताल की नाकामी रविवार को उजागर हुई। बेड न मिलने से एक मरीज जमीन पर तड़पता रहा। लालगंज क्षेत्र के मटेहना गांव निवासी अनिल कुमार पांडेय को बुखार होने के साथ सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। उसे ऑक्सीजन की जरूरत थी। परिवारीजन उसे लेकर जिला अस्पताल पहुंचे, लेकिन उसे भर्ती करने के लिए बेड नहीं मिला। इससे दो घंटे तक परिवारीजन मरीज को भर्ती कराने के लिए इधर-उधर भागते रहे। बेड न मिलने पर मरीज और परिवारीजन अस्पताल की इमरजेंसी कक्ष में बैठे रहे।
लखनऊ तक लिए वसूले जा रहे सात हजार
मरीजों को सरकारी एंबुलेंस का लाभ नहीं मिल पा रहा है। यदि कोई व्यक्ति बीमार हो रहा है तो सूचना के बाद भी एंबुलेंस नहीं मिल पा रही हैं। इसका फायदा प्राइवेट एंबुलेंस संचालक उठा रहे हैं। जिला अस्पताल की इमरजेंसी गेट के बाहर सड़क के किनारे प्राइवेट एंबुलेंस खड़ी रहती हैं।
वहीं संचालक अस्पताल के अंदर रहते हैं। पहले मरीज को लखनऊ ले जाने के लिए दो हजार रुपये लिए जाते थे, लेकिन इस समय मरीज को लखनऊ ले जाने के लिए छह से सात हजार रुपये वसूले जा रहे हैं। मरीज की जिंदगी बचाने के लिए मजबूरन तीमारदारों को पैसा देना पड़ रहा है।
यदि कोई मरीज कोरोना संक्रमित है और उसे ऑक्सीजन की जरूरत है तो उसे जिला अस्पताल में भर्ती नहीं किया जा रहा है। ऐसे मरीजों को जिला प्रशासन की ओर से बनवाए गए कोविड अस्पतालों में भर्ती कराया जा रहा है। अस्पताल में आने वाले मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने का प्रयास किया जा रहा है। दवाओं की कोई कमी नहीं है। मरीजों के साथ किसी तरह की मनमानी नहीं की जा रही है।
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डॉ.एनके श्रीवास्तव, सीएमएस, जिला अस्पताल
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