सियासी दांव-पेंच और जनता के फैसले भी अजीबोगरीब होते हैं। एक समय था, जब कांग्रेस का अपने गढ़ में कब्जा था। सोनिया-प्रियंका-राहुल का जादू यहां पर सिर चढ़कर बोलता था। समय ने फिर करवट बदली और गांधी परिवार के गढ़ में तीन सीटों पर कमल खिला।
कमल खिलने के साथ ही इन तीनों सीटों पर नहीं, बल्कि रायबरेली में राजनीति परिदृश्य में बदलाव की लहर चली और भगवा रंग फहर गया। वर्ष 2007 में कांग्रेस, वर्ष 2012 में सपा तो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने सबसे अधिक सीटें हासिल करने में महारथ हासिल की।
वहीं वर्ष 2012 की तरह इस बार फिर हाथी यानि बसपा यहां पर कोई कमाल नहीं कर पाई। वर्ष 2002 के विधानसभा निर्वाचन की बात करें तो जिले की सात सीटों पर चुनाव हुए थे। इनमें सपा ने चार सीटें झटकी थीं। इसके बाद सोनिया गांधी ने रायबरेली को अपना संसदीय चुना।
उनके सांसद बनने के बाद विकास की उम्मीद लिए जनता ने कांग्रेस का साथ दिया। अगला विधानसभा चुनाव 2007 में हुआ तो इसका असर परिणाम पर भी पड़ा। इस चुनाव में जिले की सात सीटों में से पांच पर कांग्रेस ने कब्जा किया। सपा सिर्फ एक सीट ही बचा पाई थी।
प्रदेश में बसपा की सरकार बनने के बाद कांग्रेस के गढ़ में विकास को लेकर खूब सियासत हुई। इसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा। बड़े बदलाव और विकास की उम्मीद को लेकर 2012 के चुनाव में मतदाताओं ने नतीजों का पूरा रुख मोड़ दिया।
इस चुनाव में जिले के पास सिर्फ पांच सीटें बचीं, क्योंकि दो सीटें सलोन और तिलोई नवसृजित जिले सीएसएम नगर (अमेठी)में चली गईं। जिले की पांचों सीटों पर कांग्रेस समेत सभी दलों ने खूब ताकत झोंकी और बड़े से लेकर बड़े नेता को बुलाया।
नतीजे सामने आए तो पांच में से चार सीटें सपा ने जीतकर अपनी झोली में डाल ली। इन सभी चारों सीटों पर 2007 में कांग्रेस का कब्जा था। सिर्फ इकलौती सदर सीट पर किसी भी दल का जादू नहीं चल पाया था और यहां से अखिलेश सिंह ने चुनाव जीता था।
इसी दौरान हुए बदलाव में सीएसएम नगर जिला अमेठी बन गया। इस बदलाव में सलोन विधान सभा सीट को रायबरेली में शामिल कर लिया गया। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में एक बार यहां पर राजनीति परिदृश्य बदलकर सामने आया और यहां पर छह सीटों में भाजपा सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी बन गई।
बछरावां, सलोन और सरेनी विधानसभा सीट भाजपा के खाते में गई, जबकि सदर, हरचंदपुर विस सीट कांग्रेस और सपा के खाते में ऊंचाहार सीट गई। फिलहाल कुछ भी हो, मोदी लहर में अरसे से सूखा झेल रही भाजपा इस बार चुनावी जीत का स्वाद चखने में कामयाब हो गई।