अंदर ही अंदर जमकर पैसों की बरसात हो रही है। ऐसा हो भी क्यों नहीं। कुर्सी पाने के बाद करोड़ों का वारा-न्यारा होता है। ठेके से लेकर तहबाजारी की वसूली तक में खूब मलाई है।
पांच साल में सवा अरब से अधिक का बजट मिलता है। इसके अलावा अन्य कार्य भी जिला पंचायत को ही मिल जाते हैं।
जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी जिले के प्रथम नागरिक की कुर्सी होती है। जिले की ग्राम पंचायतों को जितना बजट राज्य वित्त व अन्य योजनाओं में मिलता है।
उतना बजट अकेले जिला पंचायत को खर्च करने के लिए मिलता है। बीआरजीएफ का भी बजट मिलता है। हर साल 25 करोड़ से अधिक का बजट जिला पंचायत को मिलता है।
खास बात यह कि जिला पंचायत के कार्यों का सही ढंग से ऑडिट तक नहीं होती, इसलिए चाहे जितना खेल करो, कभी भी पकड़ में नहीं आता है।
जिला पंचायत से बनने वाली सड़कों में जमकर मनमानी होती है, लेकिन आज तक कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में तहबाजारी व अन्य ठेकों का काम भी जिला पंचायत के पास ही होता है।
इसके अलावा अन्य तमाम ऐसे काम होते हैं, जिसमें लगातार पांच साल जेब गर्म होती रहती है। हैंडपंप, सोलर लाइट लगाने का काम भी जिला पंचायत को मिलता है।
इसमें खूब खेल किया जाता है। पांच साल में अरबों का बजट मिलने के कारण ही इस कुर्सी को लेकर जंग बढ़ गई है। हर कोई इस कुर्सी पर काबिज होना चाहता है।
एक बार कुर्सी मिल गई तो कुछ और करने की जरूरत ही नहीं रहती है। जिला पंचायत सदस्यों की संख्या इस बार 52 हो गई है। ये अपना अध्यक्ष चुनेंगे।
डीडीसी को अपने पक्ष में करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। आधे से अधिक डीडीसी प्रत्याशियों के संपर्क में हैं। इसमें भितरघात की उम्मीद भी बढ़ गई है।
सदस्यों को अपने पक्ष में करने के लिए खूब रुपये उड़ाए जा रहे हैं। हालांकि देखने में तो सब कुछ सामान्य लग रहा है, लेकिन सूत्रों के अनुसार अंदर ही लाखों में डीडीसी खरीदने की चर्चा है।