पेंशनरों की संख्या अधिक रहती है, जबकि बैठने के लिए रखवाई गई कुर्सियां कम हैं। ऐसे में पेंशनरों को बैठ कर फॉर्म भरना पड़ रहा है। निशक्तों के लिए रैंप की व्यवस्था है, लेकिन वह छोटे हैं।
फॉर्म जमा कराने आ रहे बुजुर्गों का सहारा पोता या बहू बन रही है। जिले में 14 हजार पेंशन धारक हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारियों को हर साल पेंशन पाने के लिए जीवित प्रमाणपत्र जिला कोषागार में जमा करना होता है।
जिला कोषागार कार्यालय में सोमवार को जीवित प्रमाणपत्र जमा करने के लिए पेंशनरों की भारी भीड़ दिखी। कोषागार में जीवित प्रमाणपत्र जमा कराने के लिए की गई व्यवस्था कसौटी पर खरी नहीं है।
वैसे तो अलग-अलग काउंटर खोले गए हैं, लेकिन भीड़ के चलते जीवित प्रमाणपत्र जमा करने के लिए लाइन लगानी पड़ती है। प्रमाणपत्र जमा करने के बाद रसीद के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।
यही नहीं पेंशनरों को जमीन पर बैठकर फॉर्म जमा करना पड़ रहा है, क्योंकि कुर्सियां कम रखवाई गई हैं। अब तक पांच हजार पेंशनरों ने जीवित प्रमाणपत्र जमा किया है।
पहले नियम था कि एक नवंबर से 20 दिसंबर तक जीवित प्रमाणपत्र जमा किया जा रहा था। लेकिन इस बार इसमें बदलाव कर दिया गया है।
अब पेंशनर एक साल में किसी भी समय अपना जीवित प्रमाणपत्र जमा कर सकते हैं। शासन की ओर से यह व्यवस्था तो शुरू कर दी गई है, लेकिन ज्यादातर पेंशनरों को इसकी जानकारी नहीं है।
प्रचार-प्रसार न होना इसकी मुख्य वजह है। जानकारी के अभाव में पेंशनर जीवित प्रमाणपत्र जमा करने के लिए पहुंच रहे हैं।
बेलाखारा की रहने वाली मुन्नी देवी, टीकर अगाचीपुर के रामकृष्ण, सैदलीपुर के रामेश्वर सिंह राठौर और हमीरमऊ गांव निवासी राजरानी का कहना है कि हर साल में जीवित प्रमाणपत्र जमा करना पड़ता है।
आने जाने में कष्ट तो होता है, लेकिन आना तो मजबूरी हैं। जीवित प्रमाणपत्र नहीं जमा करेंगे तो पेंशन नहीं आएगी। इन सबका कहना है कि बैठने की उपयुक्त व्यवस्था नहीं है।
कुर्सियां के इंतजाम और कर दिए जाएं तो पेंशनरों को सहूलियत मिल सकती है। साथ ही रसीद देने में देरी से परेशानी हो रही है।
वरिष्ठ कोषाधिकारी सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी का कहना है कि पेंशनरों के जीवित प्रमाणपत्र जमा कराए जा रहे हैं। पेंशनरों के बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था कराई गई हैं।
प्रमाणपत्र जमा करने के दौरान कोई दिक्कत नहीं हो रही है। अब तक करीब पांच हजार पेंशनरों ने प्रमाणपत्र जमा किया है।