ऊंचाहार क्षेत्र के चड़रई में आयोजित शिवपुराण कथा के मंच पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को राम द
रायबरेली। ऊंचाहार विधानसभा क्षेत्र के चड़रई में आयोजित शिव महापुराण कथा धार्मिक आयोजन से आगे राजनीतिक चर्चा का भी केंद्र बन गई है। विश्वविख्यात कथावाचक पंडित प्रदीप मिश्रा को सुनने के लिए उमड़ रही श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच रविवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी कथा में पहुंचे। इससे आयोजन का राजनीतिक महत्व बढ़ गया। प्रदेश के कई मंत्री, विधायक और सांसद भी कथा में पहुंच चुके हैं, जबकि तीन राज्यों के राज्यपालों के भी आने का कार्यक्रम है। बड़े नेताओं की मौजूदगी से कैबिनेट मंत्री डॉ. मनोज कुमार पांडेय का क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव चर्चा में है।
कथा से पहले निकली कलश यात्रा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए थे। रविवार को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कथा में पहुंचकर सनातन धर्म की महत्ता और सामाजिक एकजुटता का संदेश दिया। उन्होंने डॉ. मनोज कुमार पांडेय के कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह ऊंचाहार में सनातन के साथ विकास को भी आगे बढ़ा रहे हैं।
आयोजन में प्रदेश सरकार के मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों और अन्य विशिष्ट अतिथियों की लगातार मौजूदगी से क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों में भी उत्साह है। बड़े नेताओं की मौजूदगी को अवध क्षेत्र की राजनीति में डॉ. मनोज पांडेय के बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा है।
अवध के राजनीतिक समीकरणों पर असर
डॉ. मनोज पांडेय अवध क्षेत्र के प्रमुख राजनीतिक चेहरों में शामिल हैं। धार्मिक आयोजनों में उनकी सक्रियता, प्रदेश सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी नजदीकी उन्हें क्षेत्रीय राजनीति में अलग स्थान देती है। मुख्यमंत्री, राज्यपालों और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी से उनके प्रभाव को लेकर चर्चाएं और तेज हुई हैं। रायबरेली में कांग्रेस का लंबे समय से प्रभाव रहा है, वहीं भाजपा भी संगठन और सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में बड़े धार्मिक आयोजन में शीर्ष नेताओं की मौजूदगी को राजनीतिक नजरिये से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2027 के चुनाव से जोड़कर देख रहे राजनीतिक जानकार
शिव महापुराण कथा में उमड़ी भीड़ और बड़े राजनीतिक एवं संवैधानिक पदों पर आसीन अतिथियों की मौजूदगी ने वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर भी चर्चाएं शुरू कर दी हैं। राजनीतिक जानकार आयोजन को डॉ. मनोज पांडेय की क्षेत्रीय सक्रियता, जनसंपर्क और संगठनात्मक प्रभाव के संदर्भ में देख रहे हैं। हालांकि, आयोजन की धार्मिक प्रकृति के बीच इसके राजनीतिक असर का आकलन चुनावी समीकरण बनने के बाद ही स्पष्ट होगा।