फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

तब के नेता अब नेपथ्य में

विज्ञापन
विज्ञापन
तब के नेता अब नेपथ्य में
विज्ञापन

राममंदिर आंदोलन से जुड़े अधिकांश नेता लाइमलाइट से रहे दूर, कुछ हो गए परलोकवासी
राजनीति में आने से बनाई रखी दूरी, आंदोलन के बाद जुट गए अपने काम से
प्रतापगढ़। जिले में राममंदिर आंदोलन को धार देने वाले नेता अब नेपथ्य में हैं। मंदिर आंदोलन के दौरान अहम भूमिका निभाने वाले ज्यादातर नेताओं ने खुद राजनीति से दूरी बनाए रखी तो कुछ अब परलोकवासी हो गए हैं। ये वो लोग थे जिन्होंने जिले में संघ और विहिप की कमान संभालते हुए मंदिर निर्माण के लिए हिंदुओं को जगाने का प्रयास किया। विवादित ढांचा विध्वंस के बाद जेल भी गए।
विज्ञापन

जनसंघ से जुड़े विवेकनगर के रहने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता राममूर्ति तिवारी, रामलीला मैदान के सामने रहने वाले मुरली केसरवानी, जेठवारा के धनसारी निवासी अंबिका सिंह लल्ला, पूरे गोदई शुकुलपुर का पुरवा लीलापुर के रहने वाले डा. शुक्ला, शहर के बाबागंज निवासी नंदलाल केसरवानी समेत दर्जनों ऐसे लोग थे जिन्होंने जिले में राम मंदिर आंदोलन की बागडोर संभाल रखी थी। इनमें से कुछ लोग संघ तो कुछ विहिप से जुड़े थे। जिले में राममंदिर आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। संघ से जुड़े और राम मंदिर आंदोलन में भाग लेने वाले मुरलीधर केसरवानी ने बताया कि छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद उनके साथ अधिवक्ता अर्जुन सिंह, रामअवतार खंडेलवाल, हीरालाल दूबे आदि को पुलिस ने पकड़कर जेल भेज दिया था। इनमें रामअवतार और हीरालाल दूबे अब इस दुनिया में नहीं हैं। जिले में राम मंदिर आंदोलन की कमान संभालने वाले और उस समय विहिप के जिला मंत्री रहे नंदलाल चौरसिया बताते हैं कि राम मंदिर आंदोलन के समय अधिवक्ता अर्जुन सिंह विहिप के अध्यक्ष थे। वह करीब 12 साल तक इस पद पर बने रहे। मंदिर आंदोलन के दौरान जेल भी गए। 87 साल की उम्र में आज भी वह पूरी तरह सेहतमंद हैं और वकालत कर रहे हैं। मंदिर आंदोलन को जिले में खड़ा करने में डा. गुलाबचंद्र खत्री और और लखनलाल ने भी अहम भूमिका निभाई। यह दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं। जिला उपाध्यक्ष रहे चंद्रिकन के रहने वाले देवनारायण पांडेय, विहार ब्लाक के रहने वाले जटाशंकर तिवारी विहिप में सहमंत्री थे। इन लोगों के साथ मंदिर आंदोलन में रामआसरे पाल ने भी अहम जिम्मेदारी निभाई। बाद में यह सभी नेता नेपथ्य में चले गए। खुद को हमेशा लाइमलाइट से दूर रखा और सक्रिय राजनीति में कदम रखने से भी परहेज किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें