भगवान राम का बेल्हा से है गहरा नाता
चौदह वर्ष के वनवास पर जाते समय जिले में पार की थी सई नदी, गए थे शृंगवेरपुर
प्रतापगढ़। मर्यादा और आदर्श के प्रतीक पुरुषोत्तम भगवान राम का बेल्हा से गहरा नाता है। रघुकुल की रीति व पिता राजा दशरथ के वचन को निभाने के लिए चौदह वर्ष तक वनवास काटने जाते समय भगवान श्रीराम बेल्हा से होकर गुजरे थे। धार्मिक ग्रंथों में भी इसका जिक्र मिलता है। वह जिले में सई नदी पारकर शृंगवेरपुर होते हुए प्रयाग के रास्ते चित्रकूट पहुंचे थे। भगवान राम से जुड़े यहां कुछ धार्मिक स्थल व कथाएं भी हैं। जिसका जिक्र न सिर्फ पुराणों में मिलता है बल्कि रामचरितमानस व वाल्मीकि रामायण भी इसके प्रमाण देते हैं। पौराणिक मान्यताओं को ध्यान में रखकर ही जिले से होकर राम वनगमन मार्ग बनाया जा रहा है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह कथा त्रेतायुग की है। आचार्य ओमप्रकाश पांडेय अनिरुद्ध रामानुजदास व पं. आलोक मिश्र बताते हैं कि उस समय अवध राज्य के नरेश राजा दशरथ थे। राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। जिसके माध्यम से उनकी तीनों रानियों ने चार पुत्रों को जन्म दिया। भगवान विष्णु ने राजा दशरथ के घर में भगवान राम के रूप मेें जन्म लिया था। उन्होंने राक्षसों का विनाश करने, धर्म की स्थापना, समाज में मर्यादा व आदर्श का संदेश देने के लिए अवतार लिया था। रानी कौशल्या से भगवान राम, कैकेयी से भरत और सुमित्रा की कोख से लक्ष्मण और शत्रुघ्न ने जन्म लिया था। शिक्षा-दीक्षा के बाद राजा दशरथ ने गुरु वशिष्ठ से राय लेने के बाद राम को अवध का राजा बनाए जाने की घोषणा की। जिससे अवध में खुशी की लहर दौड़ पड़ी। रानी कैकेयी की दासी को यह बात नागवार गुजरी और उसने उन्हें भड़काना शुरू किया। राम को चौदह वर्षों का वनवास व भरत को राजगद्दी मांगने के लिए प्रेरित किया। दासी के भडक़ावे में आई कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वरदान मांग लिए। पहला अपने पुत्र भरत को राजतिलक व राम को चौदह वर्षों का वनवास। रघुकुल की रीति व वचन को निभाने की विवशता में राजा दशरथ को दोनों ही वरदान देने पड़े। भगवान राम के साथ पत्नी धर्म का पालन करने मां सीता व अनुज लक्ष्मण भी वनवास को रवाना हुए तो पूरा अवध भी चल पड़ा। आचार्य ओमप्रकाश पांडेय व पंडित आलोक मिश्र बताते हैं कि वन जाते समय भगवान राम ने अवधवासियों के साथ तमसा नदी के तट पर रात्रि विश्राम किया था। इसका जिक्र रामचरित मानस के अयोध्या कांड में 84वें दोहे में कुछ इस तरह है...तमसा तीर निवास किए प्रथम दिवस रघुनाथ...। उन्होंने बताया कि पुराणों में जिक्र है कि तमसा नदी के तट पर अवधवासी भी भगवान राम के साथ वनवास जाने के लिए अड़े हुए थे। इसलिए भगवमान राम रात्रि विश्राम के लिए रुके और रात में ही अवधवासियों को तट पर छोडक़र सुमंत के साथ आगे बढ़े। भगवान राम, सीता व लक्ष्मण के साथ वनवास के दौरान अयोध्या से प्रतापगढ़ जिला होकर शृंगवेरपुर, प्रयाग व चित्रकूट गए थे। वाल्मीकि रामायण के पंचम सर्ग में इसका जिक्र है। इसमें साफ कहा गया है कि भगवान रघुनाथ ने शीघ्रगामी घोड़े से तैयार रथ के माध्यम से गोमती व सई नदी को पार किया था। उन्होंने बताया कि जनपद सीमा से सोंदरिया का पुरवा, जगदीशपुर, रामनगर, ईश्वरपुर का पुरवा (ईसीपुर) होते हुए भगवान राम ने सई नदी पार की थी। यहीं पर स्थित देवघाट पर उन्होंने भगवान शिव का पूजन किया था। इसके बाद मोहनगंज, जेठवारा के रास्ते कन्हैयापुर, त्रिलोकपुर, श्रृंगवेरपुर होते हुए चित्रकूट गए थे।