भजन पर मंत्रमुग्ध रहे श्रोता
मंद मुस्कान की जादू चला दे जरा, अपनी भक्ति की सरिता बहा दे जरा। सुना सुना है गिरधर गोपाल तोहे हम जानीला, दुर्योधन घर मेवा त्यागो साग विदुर घर खाओ तोहे हम जानीला आदि भजनों पर श्रोता झूमते रहे। स्वामीजी ने कहा कि जब दुर्योधन ने कहा कि भगवान मेरे घर भोजन कर लिजिए तो माधव ने कहा कि भोजन केवल दो अवस्था में ही किया जा सकता है। या तो प्रेम हो या फिर कोई भूख से मर रहा हो, और यहां ऐसा कुछ नहीं है। बताया कि विदुरानी जिनका नाम सुलभा था उसको एक ही साड़ी थी और वह भी तीन समय वह धुलकर अपनी टटिया में बंद कर सुखाकर पहनती थीं, लेकिन माधव ने मेवा त्यागकर विदुर के घर साग खाने पहुंचे थे। रामभद्राचार्य ने आयोजक परिवार के मुखिया रहे स्व. अंबिका प्रसाद मिश्र के चित्र को व्यासपीठ पर मंगाकर नमन किया।