शिक्षक जगदंबा प्रसाद ने सोमवार को इलाहाबाद जाने के लिए सरयू एक्सप्रेस का टिकट लिया। पता चला कि ट्रेन दो घंटे लेट है। दो घंटे के इंतजार के बाद सरयू अनिश्चित समय के लिए लेट हो गई। ट्रेन का कुछ पता नहीं था। जगदंबा को भी इलाहाबाद पहुंचना था। उनके सामने टिकट वापसी के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं था। मगर ऐसा नहीं हुआ। जगदंबा टिकट काउंटर पर पहुंचे और बाबू से टिकट वापस करने को कहा। टिकट देखते ही बाबू का पारा चढ़ गया। बोला तीन घंटे बीत चुके हैं। अभी तक कहां थे। टिकट वापस नहीं होगा। जगदंबा ने बहुत कोशिश की। मगर टिकट वापस नहीं हुआ। हारकर वे लौट आए और बस पकड़कर इलाहाबाद चले गए। अब इसमें जगदंबा का क्या दोष है। ऐसे न जाने कितने यात्री रोज आते हैं जिनकी जेब ट्रेन लेने होने के कारण खाली होती है। उनका टिकट वापस नहीं होता है। मगर उनकी सुनने वाला कोई नहीं हैं।
रेलवे के नियमों के मुताबिक, यात्री ने जिस समय टिकट लिया है, उससे तीन घंटे के भीतर तक उसका टिकट वापस किया जा सकता है। टिकट लेते टाइम छप जाता है। तीन घंटे बाद टिकट बेकार हो जाता है। दो साल पहले रेलवे ने यह नियम लागू किया था। यात्रियों का कहना है कि रेलवे को इस तरह के तुगलकी नियम को बदलना चाहिए। रेल विभाग केवल अपना हित देख रहा है। इससे तो केवल यात्रियों का नुकसान हो रहा है।
पहली स्थिति: टिकट लेने के बाद ट्रेन तीन घंटे लेट हो जाती है। आने के बाद भीड़ की वजह से यात्री उसमें चढ़ नहीं पाता है। उस समय यात्री का टिकट वापस नहीं होता है। दूसरी स्थिति: ट्रेन पहले दो घंटे लेट रहती है। बाद में अनिश्चितकाल के लिए लेट हो जाती है। उसमें भी टिकट वापस नहीं होता है। देखा जाय तो दोनो ही दशा में फायदा केवल रेलवे का हो रहा है। खास बात है कि दोनों ही मामलों में टिकट वापसी का अगर कोई स्पष्ट सरकुलर है भी तो वह यात्रियों को बताया और दिखाया नहीं जाता है। इससे यात्रियों में भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है। उसके जेहन में भी रेलवे की साफ-सुथरा छवि नहीं रह जाती है। इसमेें रेलकर्मी भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। यात्री जब नियम कानून की बात करता है। उसकी सुनी नहीं जाती है। उल्टे डांट फटकार कर भगा दिया जाता है। इस तरह के तमाम सवाल है जिनका जवाब अधिकारियों के पास नहीं हैं।