महाविद्यालयों में अध्ययन करने वाले छात्र-छात्राओं का खेल सर्टिफिकेट पैसा लेकर बनाया जा रहा है। इसके लिए शिक्षक मनमाना पैसा वसूल रहे हैं। वहीं प्रमाणपत्र पाने की लालच में छात्र-छात्राएं भी पैसा देने से गुरेज नहीं कर रहे हैं। इस तरह बिना खेल प्रतियोगिताओं में शामिल हुए ही छात्र-छात्राओं को खिलाड़ी का प्रमाणपत्र आसानी से मिल जा रहा है। जबकि कॉलेज के सही खिलाड़ियों को प्रमाण पत्र नहीं उपलब्ध कराया जा रहा है।
जिले के तमाम महाविद्यालयों में हर वर्ष कॉलेज स्तरीय क्रीड़ा प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। जिसमें दौड़, गोला फेंक, डिसकस थ्रो, ऊंची कूद व लंबी कूद समेत तमाम खेल शामिल हैं। जिसमें कॉलेज के खिलाड़ी छात्र-छात्राएं प्रतिभाग करते हैं। खेल शिक्षकों की लापरवाही से कॉलेज के तमाम खिलाड़ियों को सर्टिफिकेट नहीं मिल पाता है। इसी का फायदा उठाकर शिक्षक खेल में प्रतिभाग करने वाले खिलाड़ियों के नाम के स्थान पर दूसरे का नाम अंकित कर सर्टिफिकेट बना रहे हैं। इसके बदले में छात्र-छात्राओं से सुविधा शुल्क भी वसूला जा रहा है। वहीं प्रमाण पत्र पाने की लालच में छात्र-छात्राएं भी पैसा देने में गुरेज नहीं कर रहे हैं।
इसी तरह कई महाविद्यालयों में अन्तर्महाविद्यालीय प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। जिसमें दूसरे जिले के महाविद्यालय के छात्र-छात्राएं भी प्रतिभाग करते हैं। ऐसे में सहभागिता करने वाले सभी महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं को प्रमाणपत्र विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। साथ ही उपविजेता व विजेता टीम के खिलाड़ियों को भी प्रमाण पत्र दिया जाता है। छात्र-छात्राओं का आरोप है कि शिक्षक कॉलेज के अच्छे खिलाड़ियों को खेलने के लिए दबाव बनाते है, लेकिन बाद में उन्हें सर्टिफिकेट उपलब्ध नहीं कराया जाता है। बल्कि पैसा लेेने के बाद शिक्षक दूसरे छात्र-छात्राओं के नाम पर सर्टिफिकेट बना देते हैं।
खिलाड़ी छात्र-छात्राओं का कहना है कि अन्तर्महाविद्यालीय खेल का महत्व अधिक होता है। राज्य व केंद्र द्वारा आयोजित होने वाली भर्तियों में अन्तर्महाविद्यालीय खेल सर्टिफिकेट लगाने से छूट मिलती है। जबकि कॉलेज स्तरीय सर्टिफिकेट लगाने से महज 2 नंबर तक ही छूट मिल पाती है। इसलिए अधिकांश छात्र-छात्राएं बिना खेले ही अन्तर्महाविद्यालीय खेल सर्टिफिकेट बनवाने के लिए परेशान रहते हैं। वहीं शिक्षक पैसे के लालच में आकर सर्टिफिकेट बना भी देते हैं।