एमडीपीजी काॅलेज के महिला छात्रावास में करीब दस साल से छात्राओं के बजाय महाविद्यालय के कर्मचारी रह रहे हैं। छात्राओं के अधिकांश आवेदनों को बिना कारण निरस्त कर दिया गया है। इस वजह से अभिभावक और छात्राओं में रोष है।
एमडीपीजी कालेज की छात्राओं के लिए महाविद्यालय परिसर में 2005 में छात्रावास का निर्माण कराया गया था। करीब 80 फीसदी धनराशि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने दी थी। जबकि 20 फीसदी धनराशि महाविद्यालय प्रशासन ने लगाई थी। बताया जाता है कि यूजीसी ने ग्रामीण इलाकों से शहर में कमरा लेकर रहने वाली छात्राओं कोआवास मुहैया कराने के लिए महाविद्यालय को निर्देश दिया था, लेकिन महाविद्यालय प्रशासन की अनदेखी से करीब एक दशक से एक भी छात्रा को हॉस्टल का आवंटन नहीं हो सका।
महाविद्यालय में अध्यनरत छात्राओं का आरोप है कि साइंस से पढ़ाई करने वाली अधिकांश छात्राएं ग्रामीण इलाकों की हैं। घर दूर होने की वजह से शहर में महंगे किराये का कमरा लेकर रह रही हैं। कई बार छात्रावास के लिए आवेदन भी किया गया, लेकिन बिना कारण बताए उसे निरस्त कर दिया गया। महाविद्यालय में अध्ययन की वजह से छात्राएं डर से प्रशासन से शिकायत भी नहीं करतीं। जबकि अभिभावकों को शहर में लड़कियों के लिए कमरा तलाशना मुश्किल होता है। इनका आरोप है कि प्रवेश लेने वाली छात्राओं को छात्रावास के बारे में बताया भी नहीं जाता। जानकारी न होने की वजह से तमाम छात्राएं इसके लिए आवेदन नहीं करतीं। उन्होंने कहा कि छात्राओं के लिए बने हास्टल में महाविद्यालय के कर्मचारी रह रहे हैं।
महाविद्यालय की लापरवाही से छात्राओं व उनके अभिभावकों में रोष है। महाविद्यालय के प्राचार्य का मोबाइल स्वीच ऑफ होने की वजह से इस संदर्भ में बात नहीं हो सकी। जबकि महाविद्यालय के जन सूचना अधिकारी डॉ. सीएन पांडेय ने बताया कि महाविद्यालय में अध्ययन करने वाली अधिकांश छात्राएं स्थानीय हैं। दस साल से अभी तक एक भी आवेदन नहीं आया है। आवेदन करने वाली छात्राओं को कमरा अलाट किया जाएगा।