पिछड़ा वर्ग का रैपिड सर्वे जिले में मजाक बन गया है। सर्वे में लगाए गए कर्मचारी गंभीरता से काम नहीं कर रहे। वह एक जगह बैठ कर रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। सर्वे रिपोर्ट बनने से पहले ही इस पर अंगुली उठने लगी है। मगर इस ओर अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे हैं। सरकार पिछड़ा वर्ग की संख्या जानने के लिए रैपिड सर्वे करा रही है। इस काम में सफाई कर्मियों के साथ ग्राम पंचायतों में तैनात अन्य कर्मी लगाए गए हैं। सर्वे से जुड़े कुछ लोग बताते हैं कि सर्वे में लगाए गए कर्मचारी मनमानी पर उतारू हैं। गांवों में घर-घर जा कर पूरा ब्योरा तैयार किया जाना चाहिए। मगर वे ऐसा नहीं कर रहे। चाय-पान की दुकानें रैपिड सर्वे का कार्यालय हो गई हैं।
पर सुबह शाम उनके जरिए सर्वे का काम किया जा रहा है। इन दुकानों पर आने-जाने वाले संबंधित गांव के लोगों से कर्मचारी जानकारी लेकर सूची में चाही गई सूचनाएं दर्ज कर रहे हैं। इस तरह सर्वे रिपोर्ट तैयार होने से पहले ही लोगों की नजर में संदिग्ध हो गई है। कर्मचारियों के इस खेल की तरफ अफसरों का ध्यान नहीं जा रहा। अनदेखी का यही हाल रहा तो सर्वे सूची में फेंक आंकड़ों का होना तय है। अगर ऐसा हुआ तो शासन की मंशा पर पानी फिर जाएगा। कहा यह भी जा रहा है कि इस काम में ब्लाक स्तरीय अधिकारी भी उनका साथ दे रहे हैं। सर्वे की स्थिति जानने के लिए अधिकारी गांव नहीं जा रहे। नोडल अफसर भी सर्वे में लगे कर्मियों की स्थिति देखना मुनासिब नहीं समझ रहे।