जच्चा और बच्चा की सुरक्षा के तमाम दावे स्वास्थ्य महकमा भले कर ले, लेकिन हकीकत कुछ और है। इस समय मातृत्व सप्ताह मनाया जा रहा है। जानकर हैरानी होगी कि जिला महिला अस्पताल आने वाली गर्भवती महिलाओं को केवल ब्लड प्रेशर नपवाने के लिए जिला पुरुष अस्पताल जाना पड़ रहा है। एक सप्ताह के भीतर दस महिलाओं को जिला अस्पताल भेजा गया। इसमें कुछ स्टाफ के घर की गर्भवती महिलाएं भी थीं। यह जोखिम भरा कदम स्वास्थ्य महकमे की लापरवाही से उठाना पड़ रहा है। परिजनों का कहना है कि आते-जाते वक्त रास्ते में अगर महिलाओं को कुछ हो जाता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा। डॉक्टर और स्टाफ का कहना है कि उनके पास बीपी उपकरण नहीं हैं। अस्पताल प्रशासन का दावा है कि उपकरण हैं। यह तब हो रहा है जब सूबे के मुख्यमंत्री की पसंदीदा योजना मातृत्व सप्ताह मनाया जा रहा है।
महिला अस्पताल पहुंची गर्भवती महिला का सुरक्षित प्रसव कराना स्वास्थ्य महकमे की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य महकमे ने इसके लिए तमाम तरह की सुविधाएं अस्पताल में उपलब्ध कराई हैं। सुविधाओं को मरीजों तक पहुंचाने का काम अस्पताल के डॉक्टर और स्टाफ का है। डिलेवरी से पहले ब्लड, यूरिन, एचआईवी और बीपी जैसी महत्वपूर्ण जांच कराई जाती है। इसमें से ब्लड प्रेशर की जांच की बात आती है तो महिला अस्पताल जांच करने से हाथ खड़ा कर देता है। गर्भवती महिलाओं को पर्चा थमाकर उनको बीपी की जांच के लिए जिला अस्पताल रेफर कर दिया जाता है। डॉक्टर तीमारदारों को इतना डरा देते हैं कि वह जैसे तैसे गर्भवती को लेकर जिला अस्पताल पहुंच जाता है। अस्पताल प्रशासन गर्भवती को उसके हाल पर छोड़ देता है। उसके साथ न तो अस्पताल का कोई स्टाफ जाता है और न ही वहां तक जाने के लिए अस्पताल की ओर से साधन मुहैया कराए जाते हैं। संयोग से अगर रास्ते में मरीज को कुछ हो जाता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी। जिला अस्पताल आई अंतू की गीता देवी, पट्टी की शीला और लालगंज इलाके की मीना और गुड़िया को इस तरह की परेशानी उठानी पड़ी।