डाकघर के खातों में नामिनी बने लोगों का रजिस्टर गायब हो गया है। उप डाकघर निरीक्षक की जांच में खुलासा होने के बाद भी दोषी पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। रजिस्टर गायब होने से खाताधारकों को कुछ हुआ तो नामिनी बने लोग उनकी जगह पैसा नहीं निकाल सकेंगे। उत्तराधिकारियों को पैसा निकालने के लिए नाकों चने चबाने पड़ेेंगे। हैरत की बात ये है कि रिपोर्ट मिलने के बाद भी हजारों लोगों से जुड़े इस मामले को लेकर जिम्मेदार खामोश हैं। इस खामोशी की वजह अब तक स्पष्ट नहीं हो सकी है।
उपभोक्ताओं के दस्तावेज को लेकर डाक विभाग के संजीदगी की पोल खुल चुकी है। कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक डाकघर में खुले खातों व उससे जुड़े लोगों के कागजात को लेकर तनिक भी गंभीर नहीं हैं। इस उदासीनता का ताजा उदाहरण कोहड़ौर डाकघर है। कोहड़ौर निवासी श्यामशंकर शुक्ल एक खाते में नामिनी थे। वह पैसा निकालने पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि नामिनी रजिस्टर में उनका नाम ही नहीं है। यह सुन उनके पांव तले जमीन खिसक गई। मामले की शिकायत उन्होंने अफसरों से की। इसी बीच उनके घर का एक और सदस्य नामिनी होने का दावा करने लगा। बताते हैं कि विवाद शुरू हुआ तो वह उपभोक्ता फोरम चले गए। फोरम की सख्ती के बाद प्रवर अधीक्षक डाकघर ने उप डाकघर निरीक्षक केंद्रीय को जांच सौंप दी। पड़ताल के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट दी। बताया कि डाकघर में कंप्यूटराइज्ड सिस्टम होने के बाद सब कुछ उसी में फीड हो रहा है।
वह नामिनी रजिस्टर पुराना था और काफी पहले गायब हो चुका है। उन्होंने रिपोर्ट में स्पष्ट कहा कि इस रजिटर के गायब होने की सूचना वर्तमान उप डाकपाल व पूर्व उप डाकपाल ने ने नहीं दी। ऐसे में यह नहीं साफ हो पा रहा कि वह नामिनी रजिस्टर किसके समय में गायब हुआ और उसमें कितने लोगों का नाम शामिल था। रिपोर्ट में यह भी लिखा कि ऐसे में दोषी को चिह्नित करना मुश्किल हो गया है। सूत्र कहते हैं कि यह तो एक बानगी है। यदि जांच की जाए तो अन्य डाकघरों में भी इस तरह के चौंकाने वाले मामले सामने आएंगे। जानकार बताते हैं कि खाताधारक को कुछ होने पर उसके जरिए नामिनी बनाया गया व्यक्ति ऐसे हालात में पैसा नहीं निकाल सकेगा। क्योंकि नामिनी रजिस्टर में खाता और उसका नाम मिलान करने के बाद ही उसे पैसा दिया जाता है।