ये सब जो दिखाया जा रहा है..। भाई के प्रति भाई का अगाध प्रेम, एक दूसरे के प्रति त्याग और आदर्श की भावना। सचमुच ऐसा ही था अयोध्या के समय का रामराज। केवल क्षण भर की इस कल्पना मात्र से भरत मिलाप देखने उमड़े हजारों जनमानस की आंखों से आंसू बह निकले। थोड़ी देर के लिए लगा कि मानों वे सभी भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में खड़े होकर भाइयों के इस अलौकिक प्रेम और मिलन के साक्षी बन रहे हों। भाई के प्रति भाई का कर्तव्य और मर्यादाएं क्या होनी चाहिए, इसकी भी सीख जिले के लोगों को भरत मिलाप दे गया।
भरत मिलाप देखने आए लोगों ने देखा कि किस तरह से भरत ने राज सिंहासन का मोह त्यागते हुए मर्यादा में रहकर चौदह साल तक राम की प्रतीक्षा की। चौक घंटाघर पर भाइयों के बीच प्रेम को देखकर भीड़ की आंखों से आंसू निकल आए। लोगों ने पलक बंदकर मन की आंखों से रामराम का खाका खींचा। आंखें खुलीं तो भीड़ में चर्चा शुरू हुई कि जब उस समय का रामराज ऐसा था तो आज का रामराज कहां लुप्त हो गया। भरत मिलाप से इसकी सीख लेकर आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प मेले में लिया गया।
श्रीराम के वनगमन का मार्ग भी बेल्हा से होकर गया है। कथा के अनुसार वन जाते समय श्रीराम, लक्ष्मण और सीता ने सई नदी के किनारे देवी की आराधना की थी। इसी रास्ते से होते हुए वे श्रंग्वेरपुर घाट पहुंचे थे। इस लिहाज से भी जिले का महत्व और बढ़ जाता है।