पहलवान सुशील कुमार ने ओलंपिक में मेडल जीतकर अचानक देश में मृत होते जा रहे कुश्ती के खेल में फिर से नई जान भर दी थी। उनकी सफलता का असर रहा कि सरकार ने भी इस ओर ध्यान देना शुरू कर दिया, लेकिन जिले में यह कुश्ती के सितारे गर्दिश में ही हैं। चाहकर भी यहां के पहलवान बुलंदियों को छू नहीं पा रहे हैं। इसके पीछे प्रमुख वजह कुश्ती को प्रोत्साहन न देना और संसाधनों का बड़ा अभाव है।
जिला स्टेडियम की बात की जाए तो यहां पर छह खेलों में एक कुश्ती भी शामिल है। पहलवान बनकर जिले का नाम रोशन करने की ख्वाहिश पाले खिलाड़ी सुबह-शाम स्टेडियम में रियाज करने आते हैं। इस समय करीब पचास के आस-पास पहलवान स्टेडियम में एक दूसरे को पटकनी देते नजर आते हैं। मगर उनको यहां पर संसाधनों का अभाव झेलना पड़ रहा है।
कुश्ती में संसाधनों का टोटा इस कदर है कि स्टेडियम में आने वाले कुश्ती (फ्री स्टाइल) के खिलाड़ियों को गद्दा भी नसीब नहीं हो पाया है। उनको स्लीपिंग बेड पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कुश्ती के दौरान गद्दा अपने स्थान से फिसल जाता है। खिलाड़ियों को हर वक्त चोटहिल होने का खतरा बना रहता है। इसकी वजह से वे अपना ध्यान दांवपेच पर कम लगा पाते हैं। इसके अलावा जिस हाल में कुश्ती सिखाई जा रही है, उसकी फर्श भी खराब है। चोट लगने पर खिलाड़ियों के लिए चिकित्सीय उपचार की व्यवस्था नहीं हैं। खिलाड़ी खुद अपना उपचार करायें। कपड़े आदि रखने के लिए आलमारी तक नहीं है।
जिले में कुश्ती को बढ़ावा देने के लिए गत वर्ष खेल मंत्रालय से करीब डेढ़ लाख रुपये आया भी तो वह लौट गया। जिला क्रीड़ाधिकारी आंनद बिहारी श्रीवास्तव ने बताया कि पैसा मार्च के अंतिम सप्ताह में आया था। बजट सत्र के चक्कर में उसका भुगतान नहीं लिया जा सका।