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प्रतापगढ़: यहां शहर के बीचोबीच बिकेगा पटाखा

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जीआईसी मैदान में पटाखों की दुकान लगाने को लगा पांडाल। - फोटो : PRATAPGARH
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शहर में हर साल शहर के बीचोबीच पटाखों की बिक्री होती है। रामलीला मैदान जीआईसी के अलावा भी गली मोहल्ले अतिशबाजी की दुकान सजती है। प्रतिबंध के बावजूद लोग अपने घरो में पटाखे डंप कर रखते हैं। जिसमें लोकल पटाखों की मात्रा अधिक होती है। जो हादसों का सबब बनते हैं।
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इस ओर प्रशासन अपनी आंखें बंद कर रखा हैै। पिछली बार पटाखा दुकानों के लाइसेंस को लेकर आखिरी समय तक प्रशासन की रस्साकशी चलती रही। अंत में प्रशासन को पटाखा कारोबार के लिए लाइसेंस देना पड़ा। संभावना है कि शहर में फिर पटाखा बिकेगा। अभी दुकान लगाने वाले अनुमति के लिए कोतवाली व तहसील का चक्कर काट रहे हैं।
शासन ने भले ही हादसों को रोकने के लिए आबादी के बीच पटाखों की बिक्री पर रोक लगाई हो, लेकिन जिले में इस आदेश का कोई असर नहीं दिखता। घनी आबादी के बीच पटाखों का निर्माण धड़ल्ले से चल रहा है। इलाकाई पुलिस व राजस्व विभाग की टीम सबकुछ जानते हुए भी अनजान बनी है। आतिशबाजों ने पटाखों की बिक्री का लाइसेंस लेने के लिए अधिकारियों के कार्यालयों में आवेदन देने के साथ ही चक्कर काटना शुरू कर दिया है।
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हालांकि अभी अनुमति बहुत कम ही दी गई है। पिछले साल शहर के रामलीला मैदान व जीआईसी परिसर में पटाखों की दुकान लगाने की अनुमति दी गई थी। उल्लेखनीय है कि ये इलाके के शहर की आबादी बीचोबीच हैं। इसके अलावा गलियों व मोहल्लों में भी दुकानें सजती हैं। लोग अपने घरों व दुकानों में पटाखे डंप रखते हैं। ऐसे में हादसे की संभावना बनी रहती है।
सभी तहसीलों में बनते हैं पटाखे
जिले की सभी तहसीलों में पटाखा बनाने का कारोबार होता है। इसके लिए आतिशबाजों को लाइसेंस बनवाना होता है लेकिन हजारों अप्रशिक्षित लोग बिना लाइसेंस के दिवाली के पर्व के पहले ही काम शुरू कर देते हैं। नगर कोतवाली के कटरामेदनीगंज, फतनपुर के सुवंसा, जेठवारा के कटरागुलाब सिंह व लालगंज और कुंडा तहसील क्षेत्र में आतिशबाज छोटे व बड़े पटाखे तैयार कर चुके हैं।
मुनाफे के लिए ज्यादा बेचे जाते हैं लोकल पटाखे
जिले में ब्रांडेड पटाखों के बजाए ज्यादातर कारोबारी ज्यादा मुनाफे के लिए चक्कर में लोकल पटाखे ही बेचते हैं। इन पटाखों को तैयार करने वाली पूरी तरह से अप्रशिक्षित होते हैं। वे पटाखों में बारूद और अन्य चीजों को इस्तेमाल अपनी मर्जी के हिसाब से करते हैं। इंसान के लिए घातक 70 डेसीबल से अधिक आवाज वाले पटाखे भी बाजार में बेचे जाते हैं।
पटाखे खरीदते समय ज्यादातर लोग यह नहीं देखते कि वह ब्रांडेड है या लोकल। निरीक्षण न होने के कारण गोदामों में मनमानी तरीके से पटाखे बनाए जाते हैं। कोई भी पटाखा मानक के अनुरूप नहीं बनता। किसी में बारूद की मात्रा अधिक होती है तो किसी में कम। सभी पटाखों के विस्फोट की गारंटी भी नहीं होती। लोकल पटाखों को बनाने के बाद उसे ब्रांडेड पटाखों से मिलते जुलते नाम से आतिशबाज पैक करते हैं ताकि आसानी से बिक्री हो सके।
तीन दिन के लिए मिलेगा लाइसेंस
आतिशबाजी की दुकान लगाने वालों को नियम व शर्ते पूरी करने के बाद तीन दिनों के लिए लाइसेंस मिलेगा। जीआईसी व रामलीला मैदान में शुक्रवार से ही दुकानें लगाई जा रहीं हैं। रामलीला मैदान में भी पूरी तैयारी है। शनिवार से दुकान सजेगी। आगे दुकान लगाने के लिए दुकानदारों में होड़ लगी हुई है। फायरब्रिगेड की टीम भी आतिशबाजी की दुकान लगाने वालों को आग से बचाव के मानक पूरा करने के बाद ही दुकान लगाने के लिए संस्तुति कर रही है।
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