बंगलौर के उद्योगपति रमेश सिपानी ने कंपनी का संचालन शुरू किया। इसके बाद ट्रैक्टर का निर्माण बंद हो गया, मगर डीजल इंजन का निर्माण कर दूसरे प्रांतों को भेजा जाने लगा। कर्ज के बोझ तले दबी फैक्ट्री 15 मई 1998 को पूरी तरह बंद हो गई। इससे कर्मचारी बेरोजगार हो गए। कुछ कर्मचारियों को सरकार ने अन्य विभागों में समायोजित किया। वर्ष 1999 में कर्मचारियों और कर्ज देने वालों ने बकाए के भुगतान के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में वाद दायर किया। कोर्ट ने मामले के निस्तरण के लिए परिमापक नियुक्त कर दिया।
लंबे समय तक सुनवाई के बाद कोर्ट ने इस मामले एटीएल की करीब दो सौ बीघा जमीन बेचने को लेकर डीएम को मूल्यांकन करने का आदेश दिया था। इस बीच सांसद संगमलाल गुप्ता ने जिले में नए सिरे से उद्योग-धंधे स्थापित करने के लिए लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग के किनारे स्थित करीब दो सौ बीघा जमीन सरकार से कब्जे में लेने के लिए सिफारिश की।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सहमति के बाद इसका रास्ता साफ हो गया और सरकार 67.92 करोड़ रुपये की देनदारी चुकाने के लिए तैयार हो गई। शासन के हलफनामे के बाद हाईकोर्ट ने 30 जून 2022 को पारित आदेश में उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास प्राधिकरण को 67.92 करोड़ रुपये परिमापक के पास जमा कराने के निर्देश दिए हैं। देनदारी चुकाने के बाद जमीन सरकार के हाथ में आ जाएगी। जिस पर किसी बड़े उद्योग की स्थापना हो सकती है।
जमीन का मूल्यांकन करने के लिए बनी थी दो सदस्यीय टीम
कर्मचारियों और बैंकर्स का बकाया भुगतान करने के लिए हाईकोर्ट ने एटीएल की जमीन बेचने के लिए डीएम को मूल्यांकन कराने का निर्देश दिया था। डीएम ने तत्कालीन एसडीएम विनीत उपाध्याय और डीजीसी विवेक उपाध्याय की टीम बनाकर जमीन का मूल्यांकन करने का निर्देश दिया था। दो सदस्यीय टीम ने 59,81,95.00 करोड़ रुपये जमीन की मालियत बताई थी। जबकि देनदारी के लिए सिर्फ 67.92 करोड़ रुपये की आवश्यकता थी।
तीन गांवों से अधिग्रहीत की गई थी जमीन
एटीएल की स्थापना के लिए सरकार ने तीन गांवों के किसानों से जमीन अधिग्रहीत की थी। बड़नपुर में 30.711 हेक्टेयर, भुपियामऊ 9.8280 और टेऊंगा से 2.1690 हेक्टेयर जमीन ल गई थी। कुल जमीन करीब दो सौ बीघा थी। हालांकि वर्तमान में फैक्ट्री की जमीन पर काफी लोगों ने अवैध कब्जा भी कर रखा है।
हाईकोर्ट में विचारधीन थे 29 मामले
एटीएल ट्रैक्टर फैक्ट्री से संबंधित 29 मामले हाईकोर्ट में विचाराधीन थे। इसमें कर्मचारियों का बकाया, बैंकों की देनदारी, इंश्योरेंस कंपनी का बकाया सहित अन्य मामले थे। मार्च से जून के बीच में कोर्ट ने सभी मामलों का निस्तारण करने के बाद 30 जून 2022 को अंतिम आदेश दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एटीएल ट्रैक्टर फैक्ट्री के संबंध में जो फैसला दिया है, वह कर्मचारियों और बकाएदारों के हित में है। सांसद संगमलाल गुप्ता की पहल काम आई और अब एटीएल की जमीन नहीं बेची जाएगी। खाली पड़ी जमीन पर बड़ी औद्योगिक इकाई की स्थापना का रास्ता साफ हो गया है। - विवेक उपाध्याय, शासकीय अधिवक्ता, ग्रामसभा
चौबीस साल की लंबी लड़ाई के बाद कर्मचारियों को मिला न्याय
एटीएल फैक्ट्री के कर्मचारियों को 24 साल की लंबी लड़ाई के बाद न्याय मिला है। उच्च न्यायालय के आदेश के बाद जुलाई माह में उनका भुगतान होने की उम्मीदें बढ़ गई हैं। कर्मचारियों ने अपने भुगतान के लिए दावा पत्र प्रस्तुत कर दिया है। वर्ष 1998 में एटीएल के बंद होने के बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उम्मीद जताई जा रही है कि कर्मचारियों के हिस्से में लगभग 35-35 लाख रुपये आएंगे।
शहर से चार किमी दूर कटरामेदनीगंज में दो सौ बीघे में फैले एटीएल ग्राउंड में स्थित रमेश सिपानी की कंपनी 1998 में बंद हो गई। जिस समय कंपनी बंद हुई उस 622 कर्मचारी काम कर रहे थे। कर्मचारियों का बकाया दिए बगैर कंपनी का फरार हो गई। इस पर कर्मचारियों ने कंपनी के खिलाफ 1999 में उच्च न्यायालय इलाहाबाद में वाद दायर कर न्याय मांगा। कोर्ट के आदेश के मुताबिक, कर्मचारियों का 60 साल तक की सेवा का वेतन और बकाया भुगतान किया जाएगा।
24 साल की लंबी लड़ाई के बाद उच्च न्यायालय ने 622 कर्मचारियों को 21,73,93,377.57 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। कोर्ट का आदेश आने के बाद कर्मचारियों ने अपना दावा प्रस्तुत कर भुगतान की मांग की है। ऑटो ट्रैक्टर्स लिमिटेड कर्मचारी संघ के संगठन मंत्री केपी सिंह ने बताया कि एक कर्मचारी के हिस्से में 35 लाख रुपये का बकाया भुगतान आएगा। मुकदमे में 154 लोग वर्तमान समय में वादी हैं। जो कर्मचारी इस दुनिया में नहीं हैं उनके आश्रितों को बकाया रकम का भुगतान कराया जाएगा।