जनपद में तैनात कई पुलिसवाले भी प्रापर्टी डीलर बन गए हैं। भले ही उनकी दूसरे जनपदों में तैनाती है, लेकिन अपने पार्टनर के साथ मिलकर करोड़ों रुपये जमीनों में फंसाए हैं। अफसरों की छोड़िए दरोगा व सिपाही तक ने अपनी काली कमाई को दूसरे जनपदों में खपाया है। रिश्तेदारों के बल पर वे अपनी काली कमाई को पचाने में कामयाब होते रहे हैं।
जनपद के थानों में तैनात थानेदार, दरोगा, सिपाही काली कमाई से अकूत संपत्ति बना लिए हैं। काफी अर्से से बेल्हा में तैनात पुलिसकर्मी प्रापर्टी डीलिंग के धंधे में शामिल हैं। चर्चा है कि प्रापर्टी के धंधे में भूमाफिया व जमीन की खरीद-फरोख्त करने वालों के पार्टनर बनकर वे अपनी काली कमाई एक नंबर करने में कामयाब हो गए हैं। पुलिसकर्मियों ने 50 करोड़ के आसपास प्रापर्टी से जुड़े कारोबार में अपना रुपया लगाया है। इलाहाबाद, कानपुर, वाराणसी व लखनऊ में आलीशान मकान बनवाने के साथ ही परिवार के सदस्यों के नाम से फ्लैट खरीद रखा है। उनका आलीशान मकान देखते ही बनता है।
दस पंद्रह वर्षो के बीच जनपद में तैनात रहे कई पुलिसकर्मी काली कमाई के जरिए मौजूदा समय में करोड़पति बन चुके हैं। उनका रहन सहन भी किसी से कम नही है। उनके पास लग्जरी वाहन हैं। वैसे प्रधानमंत्री के बेनामी संपत्ति पर कार्रवाई के दौरान यह भी देखा जा सकता है कि तमाम दिक्कतों के बाद भी पुलिसकर्मियों का वेतन बैंक से बहुत कम ही निकलता है। अब सवाल यह उठता है कि यदि वेतन के रुपये निकाले बिना उनका खर्च कैसे चलता होगा। काली कमाई को खपाने वाले पुलिसकर्मी तबादले के बाद भले ही गैरजनपद चले गए हैं लेकिन वे बराबर बेल्हा आते रहते हैं।
नेता की कृपा से सिपाही बन गया ठेकेदार
जनपद का रहने वाला एक सिपाही गैरजनपद में नेता की कृपा से ठेकेदार बन गया है। वह बड़ी सड़कों का अपने करीबियों के नाम से टेंडर लेता है। काफी दिनों तक उसे अधिकारियों ने निलंबित कर दिया था लेकिन अपने प्रभाव से बहाल हो गया। गैरजनपद की काली कमाई अपने करीबियों के माध्यम से प्रापर्टी में लगाया है। उसके पास कई लग्जरी वाहन भी हैं लेकिन वह रिश्तेदारों के नाम से। यदि बेनामी संपत्ति की सही से जांच हुई तो कई पुलिसकर्मियों के गर्दन शिकंजे में होगी।
काली कमाई के लिए नगर कोतवाली की मारामारी
पुलिसकर्मियों की मानें तो नगर कोतवाली, जेठवारा, मानधाता, अंतू, कंधई, रानीगंज, लालगंज, सांगीपुर, संग्रामगढ़, महेशगंज, मानिकपुर थानों को काली कमाई के लिए पसंद किया जाता है। सबसे अधिक नगर कोतवाली के लिए
मारामारी रहती है। पूर्व में नगर कोतवाल बनने के लिए निरीक्षकों की बोली लगती थी। मौजूदा समय में भी शहर कोतवाल बनने के लिए हर कोई हाथ पैर चलाता है। नेताओं के प्रभाव के साथ ही जुआड़ भी करता है। कोतवाली के सिपाही भी पीछे नही है। वे भी काले धंधों से हर माह वसूली कर अपनी इनकम बढ़ाते हैं।