इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने समाजवादी पार्टी के विधायक राम सिंह का चुनाव मंगलवार को रद्द कर दिया है। प्रतापगढ़ के पट्टी विधानसभा क्षेत्र में मार्च 2012 को घोषित इन चुनाव परिणाम में राम सिंह को निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के राजेंद्र प्रताप सिंह उर्फ मोती सिंह पर 156 वोटों से विजय घोषित किया गया था। इस मतगणना में पोस्टल वोट नहीं गिने गए थे, जिनकी संख्या 955 थी। मोती सिंह की याचिका पर हाईकोर्ट के जस्टिस आदित्यनाथ मित्तल ने अपने निर्णय में कहा कि राम सिंह को इन चुनाव परिणाम के कोई लाभ नहीं दिए जाएंगे। साथ ही पूर्व एमएलए के तौर पर मिलने किसी भी लाभ से भी उन्हें आदेश के तहत वंचित कर दिया गया है। दूसरी ओर पोस्टल वोट डलवाने के दौरान कायदों का पालन नहीं करने पर तत्कालीन पीठासीन अधिकारी और कानपुर में एडीएम (सिविल सप्लाई) शारदा प्रसाद यादव के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए प्रदेश सरकार को निर्देश दिए गए हैं।
क्या हुआ था : पोस्टल वोट विवाद
याचिका में मोती सिंह ने हाईकोर्ट को बताया था कि विधानसभा क्षेत्र संख्या 249 पट्टी प्रतापगढ़ से उन्हाेंने फरवरी 2012 को चुनाव लड़ा था। उन्हें 61,278 वोट मिले थे। वहीं राम सिंह को 61,434 वोट मिले और उन्हें 156 वोटों से विजेता घोषित कर दिया गया। याचिका में उन्हाेंने आरोप लगाया कि इन चुनाव में 955 पोस्टल वोट डाले गए थे, लेकिन वोटों की गिनती में उन्हें न खोला गया न शामिल ही किया गया। ये वोट रक्षा व अन्य सेवाओं में नियुक्त व्यक्तियों, जेल में बंदियों, चुनाव ड्यूटी पर आए व्यक्तियों ने डाले थे जो उस विधानसभा क्षेत्र के नागरिक थे और चुनाव के दिन मतदान स्थल पर नहीं पहुंच सकते थे। इन वोटर्स को निर्वाचन आचार नियमावली 1961 के प्रावधानों केअनुसार फॉर्म - 12 भरना होता है जिन्हें वे चुनाव की तारीख से सात दिन पहले पीठासीन अधिकारी को डाक से भेजते हैं। इसके लिए चुनाव के लिए बने प्रशिक्षण केंद्र में पोस्टल वोट सुगमता केंद्र भी बनाए गए थे। इन 955 वोटों को बैलेट बॉक्स में डालकर रखा गया।
19 फरवरी 2012 को वोटिंग हुई और 23 फरवरी 2012 को प्रतापगढ़ के उप जिला चुनाव अधिकारी ने मुख्य चुनाव अधिकारी लखनऊ को पत्र लिखकर इन 955 पोस्टल वोटों के बारे में स्पष्टीकरण मांगा। पत्र में बताया गया पीठासीन अधिकारी ने खुद ही मतदाताओं की पहचान की थी उसके बाद पोस्टल मत पत्र जारी किए थे। इस दौरान फॉर्म 13-ए जारी नहीं किया गया जो व्यक्ति की पहचान के लिए इस्तेमाल होता है। चुनाव अधिकारी ने मार्गदर्शन के लिए पत्र भारतीय चुनाव आयोग को आगे बढ़ाया। आयोग ने कहा कि उन्हीं पोस्टल वोटों को गिना जाए जो निर्धारित प्रावधानों केअनुसार जारी किए गए और प्राप्त हुए हैं। छह मार्च को मतगणना हुई जिसमें याचिकाकर्ता के चुनाव एजेंट विनोद पांडेय केअनुसार सिर्फ एक पोस्टल वोट को गिना गया जो लिफाफे में बंद होकर आया था। वहीं बैलेट बॉक्स में पड़े 955 पोस्टल वोट नहीं गिने गए बल्कि उन्हें खारिज कर दिया गया। चुनाव एजेंट पांडेय इसकी शिकायत पीठासीन अधिकारी से प्रार्थना पत्र देकर की, लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया गया, प्रार्थना पत्र भी खारिज कर दिया गया। याचिका में कहा गया कि यह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और नियमावली 1961 का उल्लंघन था। ऐसे में राम सिंह का निर्वाचन खारिज करते हुए उन 955 पोस्टल वोटों की भी गिनती की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा
साल 2012 में दायर इस याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 21 विवादों को फ्रेम किया। अपने फैसले में इन सभी का बारी बारी से निस्तारण भी किया। इनमें 11 विवाद पोस्ट बैलेट से जुड़े थे। जिनमें प्रमुख थे -
विवाद 1 : क्या चुनाव का परिणाम लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत प्रभावित किया गया है।
विवाद 2 : फॉर्म 13-ए जारी होना क्या अनिवार्य है? इसका असर?
विवाद 3 : क्या चुनाव का परिणाम 955 पोस्टल वोटों को नकारने से प्रभावित हुआ?
विवाद 4 : क्या पीठासीन अधिकारी द्वारा कानूनी जरूरतों को पूरा न करने से चुनाव बिगड़े?
विवाद 5 : क्या चुनाव आयोग को नया दिन तय करके फिर से पोस्टल वोटिंग करवानी चाहिए थी?
विवाद 7 : क्या नियमावली 1961 को फॉलो करते हुए पोस्टल वोटों को गिनना चाहिए या उन्हें खारिज करना गैर-कानूनी होगा?
विवाद 10 : क्या ये 955 वोट कायदों के अनुसार थे?
विवाद 11 : क्या पोस्टल वोटों की पीठासीन अधिकारी द्वारा ठीक से कायदों के अनुसार पहचान की गई?
अपनी मर्जी से कायदे नहीं बना सकते : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने इन विवादों को पोस्टल वोटों के विवाद की श्रेणी में रखा। अपने निर्णय में उसने चुनाव आयोग द्वारा इन वोटों पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पत्र में दिए जवाब को सामने रखा जिसमें कहा गया था कि पोस्टल वोटों के संदर्भ में जिला निर्वाचन अधिकारियों को अपनी मर्जी से कायदे नहीं बना सकते। उन्हें मौजूदा नियमों और कानूनों के तहत ही काम करना होता है। केवल उन्हीं पोस्टल वोटों को गिनने के निर्देश आयोग ने दिए थे जिन्हें कायदों के अनुसार जारी किया गया और वापस प्राप्त किया गया। ऐसे में हाईकोर्ट के जस्टिस आदित्यनाथ मित्तल ने कहा कि पट्टी के पीठासीन अधिकारी ने पोस्टल वोटों के लिए अपनी ही व्यवस्था बना ली, जिसमें पहचान के लिए फॉर्म 13-ए, बी और सी, आदि मतदाताओं को नहीं दिए गए। इन स्थितियों में पोस्टल वोटों को वैा नहीं माना जा सकता। इसकी वजह से इन वोटों को खारिज कर दिया गया।
चुनाव आयोग द्वारा फिर से वोटिंग न करवाना दुर्भाग्यपूर्ण
जस्टिस मित्तल ने कहा कि जब आयोग के पत्र से यह स्पष्ट हो गया था कि पोस्टल वोट खारिज होंगे तो उसे एक दिन और समय निर्धारित करके ताजा पोस्टल वोटिंग रखवानी चाहिए थी। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है फिर से ऐसा कोई वोटिंग नहीं करवाई गई।
मुख्य चुनाव अधिकारी पर आरोप नहीं
याचिका से यह विवाद भी उपजा कि क्या मुख्य चुनाव अधिकारी के भी विरुद्ध आरोप तय होते हैं? जस्टिस मित्तल ने कहा कि सीईओ के खिलाफ याचिका में कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं लगे हैं। ऐसे में उन्हें पार्टी नहीं बनाया जाना चाहिए।
निर्णय : याचिकाकर्ता निर्वाचित नहीं, पोस्टल वोट खारिज
जस्टिस मित्तल ने निर्णय में कहा कि राम सिंह का निर्वाचन रद्द किया जाता है। उन्हें पूर्व विधायक के तौर पर मिलने वाले किसी भी तरह के लाभ नहीं दिए जाएंगे। न ही उन्हें कोई पेंशन मिलेगी जो पूर्व विधायकों को दी जाती है। यह निर्णय 2012 के विधानसभा की अवधि तक के हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने खुद को विधायक के तौर पर निर्वाचित घोषित किए जाने की मांग की है। लेकिन उन्हें निर्वाचित घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत यह नहीं जान सकती कि खारिज किए गए 955 वोटों में मोती सिंह को कितने वोट मिले। दूसरी ओर चूंकि तकनीकी रूप से वोट खारिज हो चुके हैं, ऐसे में उन्हें गिना भी नहीं जाएगा।
लेकिन पीठासीन अधिकारी पर कार्रवाई
पीठासीन अधिकारी शारदा प्रसाद ने गवाही के दौरान बताया था कि जिन लोगों को पोस्टल बैलेट जारी किए गए, उनके नाम रजिस्टर में दर्ज थे। उन्हाेंने उन लोगों से नाम के साथ साइन करवा लिए थे। कोई और घोषणा पत्र या फॉर्म नहीं दिया। इसी वजह से ये पोस्टल वोट भी खारिज कर दिए गए। लेकिन जिरह के दौरान शारदा प्रसाद ने कहा कि कुछ को फॉर्म दिए गए थे और कुछ मतदान अधिकारियों को पोस्टल वोट के दौरान उनके मतदाता ड्यूटी कार्ड के आधार पर पहचाना गया। जस्टिस मित्तल ने अपने निर्णय में कहा कि चुनावी प्रणाली एक कर्तव्य से बंधी होती है, इसके लिए अधिनियम बनाए गए हैं। शारदा प्रसाद यादव के बयान पूरी तरह गलत साबित हुए हैं। उन्हाेंने चुनाव के लिए बने कायदों का न केवल पालन नहीं किया, बल्कि उन्हें तोड़ा भी है। इसकी वजह से चुनाव को नुकसान पहुंचा और राम सिंह ने गैर-कानूनी रूप से विधायक बनकर पद का लाभ लिया। ऐसे में शारदा प्रसाद पर प्रदेश सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए। भविष्य में उन्हें कोई भी महत्वपूर्ण दायित्व नहीं सौंपा जाए न ही महत्वपूर्ण पद पर नियुक्ति दी जाए।