हर साल की तरह इस बार भी बिचौलिए आंवला किसानों की मेहनत पर डाका डालने की तैयारी में हैं। पूरे साल देखभाल के बाद जब आंवले की फसल तैयार हो जाती है तो बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं। कंपनियों से संपर्क करके वह कम रेट का निर्धारण करते हैं। कंपनियां भी उससे ज्यादा पैसा देेने को तैयार नहीं होतीं। मंडी में भी बिचौलिये आंवले को माटी के मोल लेते हैं। किसानों के आंवले की स्थानीय स्तर पर खपत के लिए सांसद हरिवंश सिंह, कैबिनेट मंत्री मोती सिंह के अलावा जिले की प्रभारी मंत्री स्वाती सिंह भी आंवला प्रोसेसिंग यूनिट लगवाने का दावा कर चुकी हैं, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो सका है।
जिले के आंवला किसानों को चपत लगाने में बिचौलियों की सक्रिय भूमिका होती है। यहां के किसानों की गाढ़ी कमाई का पारिश्रमिक इनके ही द्वारा निर्धारित की जाती है। साल भर किसान आंवले की फसल आने से लेकर उसके पकने तक परेशान रहता है। खाद, पानी और दवा डालकर किसान पूरे साल यह उम्मीद करता रहता है कि इस बार उसकी आंवले की फसल उसे लाभ देकर ही जाएगी। बावजूद इसके बिचौलिए उनकी इस मंशा पर पानी फेर देते हैं। फसल तैयार होते ही यही बिचौलिए कंपनियों के संपर्क में आ जाते हैं। इसके बाद वे मूल्य तय कर देते हैं। उनके तय किए गए मूल्य से ज्यादा कंपनियां देना नहीं चाहतीं। किसान भी फसल तैयार होने पर ज्यादा इंतजार नहीं कर पाता। इसके चलते उसका आंवला कंपनियों तक कम रेट पर पहुंच जाता है। उसका पूर्ण पारिश्रमिक तो उसे नहीं मिल पाता लेकिन दलालों की कमाई एक मुश्त हो जाती है। बिचौलियों को आंवला बेचने से मना करने वाले किसानों को भटकना पड़ता है। चूंकि बिचौलिये पूरी तरह एकजुट होते हैं। बिचौलियों की सांठगांठ का नतीजा यह होता है कि कोई भी किसानों का आंवला मंडी में आने के बाद भी नहीं खरीदता। बताना जरूरी है कि पहले तो किसान खड़ी फसल ही दलालों को बेच देता है। अगर किसी कारण से मामला नहीं जमा तो वह इसे तोड़वाकर महुली स्थित मंडी पहुंचता है। वह आशा तो यह करके आता है कि मंडी में उसे सही रेट मिल जाएगा लेकिन यहां भी उसकी मंशा फलीभूत नहीं होती। आंवला मंडी में पहुंचने के बाद बड़े ही नाटकीय ढंग से उससे इसका सौदा किया जाता है। आंवले के पेड़ों में अच्छी फसल देख बिचौलिए अभी से सक्रिय हो गए हैं।