रेल पटरी पर लगे सिग्नल की मद्धिम पड़ चुकी लौ ट्रेनों के सफर का रोड़ा बन सकती है। रात के वक्त ढिबरियों के मद्धिम होने व बुझने से जहां ट्रेनों को रुकना पड़ रहा है वहीं दुर्घटना की भी आशंका बढ़ गई है। चालक जोखिम लेकर ट्रेनों का संचालन कर रहे हैं।
सिग्नलों को रोशन कर ट्रेनों के लिए रास्ता साफ करने का काम कर रही ढिबरियां अब जवाब दे चुकी हैं। ब्रिटिश पीरियड से चले आ रहे इस सिस्टम में अभी तक कोई बदलाव नहीं किया गया है। प्रतापगढ़, खुंडौर व पीपरपुर स्टेशन के आस-पास के करीब 70 सिग्नल ऐसे हैं जो रात में किसी काम के नहीं रहते हैं। सिग्नल की ढिबरियां बुझी रहती हैं। वजह ढिबरियों में कल्ला (बत्ती लगाने वाला) व पेंदी नहीं बचा है। हाल ये है कि दम तोड़ चुकी ढिबरियों से तेल भी बह जाता है। सूत्रों की मानें तो आलमबाग लखनऊ स्थित स्टोर से नई ढिबरियों की सप्लाई दो साल से बंद है। इसलिए जवाब दे चुकी ढिबरियों से काम चलाया जा रहा है। चालकों का कहना है कि रात में सिग्नल साफ न दिखाई देने व कहीं-कहीं बुझा होने से आगे का रूट क्लीयर नहीं हो पाता है। इससे संचालन में बाधा आ रही है। रास्ता क्लीयर न होने से दुर्घटना की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। चालक अक्सर इसकी शिकायत स्टेशन मास्टर कार्यालय व लखनऊ डिवीजन में करते हैं। मगर उनकी बात सुनी नहीं जा रही है। ऐसे में वे राम भरोसे गाड़ियों को खींचने पर मजबूर हैं।
सिग्नल न मिलने से गाड़ियों का संचालन प्रभावित हो रहा है। ट्रेन समय से नहीं पहुंच पाती हैं। सिग्नल न दिखाई देने से ट्रेेन रास्ते में रुक जाती हैं। बाद में पोर्टर को भेजकर कागजी कार्रवाई की जाती है। इसके बाद जाकर गाड़ियां आगे बढ़ती हैं। इस समय घना कोहरा और भी मुसीबत बना हुआ है।
ढिबरी से सिग्नल तभी तक रोशन हो रहे हैं जब तक रूट रिले इंटर लॉकिंग (आरआरआई) की सुविधा न हो जाए। आरआरआई यानी ढिबरी वाले सिग्नल के स्थान पर चमकीले कलर वाले स्वचालित सिग्नल। मजे की बात यह है कि प्रतापगढ़ स्टेशन आरआरआई होने वाला था। पांच साल पहले इसकी शुरूआत कर दी गई थी। सिग्नल सिस्टम के लिए केबिन का नया भवन तैयार किया गया। मगर आरआरआई का काम बीच में ही ठप हो गया। इससे करोड़ों रुपये का भवन अब आवारा पशुओं व कबूतरों का बसेरा बन गया है। गौरतलब है कि प्रतापगढ़, खुंडौर व पीपरपुर रेलवे स्टेशन पर आरआरआई होना है, जबकि इसके आस-पास के स्टेशनों पर आरआरआई हो चुका है।