जिले में गर्मी आते ही बिजली की समस्या गहरा जाती है। रोस्टर तो रोज बनता बिगड़ता रहता है। इसी में कटियामारों की ऐसी मेहरबानी होती है कि मिलने वाली बिजली भी ऐसी होती है कि पंखा घूमता रहता है हवा नहीं मिलती। बल्ब जलते हैं लेकिन रोशनी दीए के बराबर ही होती है। शहर के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में कटियामारी खूब फलफूल रही है। गांव में शाम होने पर कटिया लटकती है तो शहर में दिन दहाड़े यह सारे काम होते हैं। गुमटी दुकानदारों के साथ ही सड़क की पटरी पर लगी दुकानों पर भी फर्राटे चलते देखे जा सकते हैं। यही नहीं जूस की दुकानों पर बिजली से ही उनकी मोटरें चलती हैं। जिन इलाकों में यह सारे काम होते हैं वहां के कनेक्शनधारकों को लोवोल्टेज की समस्या से जूझना पड़ता है।
यही हाल गांवों में भी है। शाम को गांव के खंभों पर कटिया लटक जाती है। यही नहीं रात में ही मोटरों से खेत की सिंचाई भी कर ली जाती है। सुबह होने तक सारा मामला ठीक कर लिया जाता है। यही नहीं इनके लिए लो वोल्टेज से निपटने का सामान भी मौजूद रहता है। तारों से करंट उतारने के बाद यह लोग पांच किलोवाट के स्टेबलाइजर से बिजली को खींच लेते हैं। दिक्कत उन्हें होती है जिनके यहां सामान्य कनेक्शन होते हैं और मीटर लगा होता है। संबंधित कर्मचारी इनसे मिले होने के कारण इसको देखकर भी अनदेखा करते हैं। कनेक्शनधारक मीटर लगे होने के कारण बंधे होते हैं। वह जितना भी लोड बिजली पर देंगे मीटर भागना शुरू कर देता है। इससे वह सामान्य तरीके से ही बल्ब पंखे व कूलर का इस्तेमाल करते हैं। उधर कटिया लगाने वाले आराम से बिजली का भरपूर उपयोग करते हैं।