लालगंज। अझारा स्थित भागवतदत्त बालिका स्नातकोत्तर महाविद्यालय में शनिवार की रात नामचीन कवियों व शायरों ने कवि सम्मेलन और मुशायरे के जरिए समा बांधा। इससे मंच के साथ क्षेत्र में कौमी एकता की झलक मिली। हसन काजमी के गीतों की पंक्तियां, नीले गगन पर सुनते तो हैं कुदरत रहती है, लेकिन मां के पांवों के नीचे जन्नत रहती है, ने श्रोताआें के मन को छू लिया।
नासिर जौनपुरी का कलाम, कविता तुम छुपा लो मुझे जमाने से, को भी खूब वाहवाही मिली। बुजुर्ग शायर महेंद्र अश्क ने शायरी को संजीदगी देते हुए, कभी मुहफेर कर गुजरा नहीं हूं, मैं जैसा भी हूं तुझ जैसा नही हूं, सुनाया। शाइस्ता सना की पंक्तियों पर श्रोता झूमते नजर आए। उन्होंने, हर शजर से हवा नहीं मिलती, हर किसी में वफा नहीं मिलती, पर खूब तालियां बजीं। मशहूर गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना के गीत, रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा सुनाया।
डॉ. नसीम निकहत की कविता, हमारे चेहरों के दागों के तंज कसते हो, हमारे पास भी आइना है दिखाऊं क्या, खूब पंसद की गई। उस्मान मीनाई की गजल, नई जबान से बाजू निकाल लेता है, वो प्याज काट के आंसू निकाल लेता है, सबा बलरामपुरी की गजल, तुझसे मिलकर मुझे हुआ महसूस, पत्थरों के दिल भी धड़कते हैं, को भी श्रोताओं ने खूब सराहा। सविता असीम ने मोहब्बत हूं अहले दिल के लिए, और दुनिया की हर जुबान में हूं सुनाया।
सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे कुंवर बेचैन के प्यार भरे गीतों ने भी श्रोताओं को प्रभावित किया। उनकी कविता, दिल पर मुश्किलें हैं बहुत, दिल की कहानी लिखना, को खूब पंसद किया गया। इससे पहले पपलू लखनवी, डॉ. प्रवीण शुक्ल, असर अली ने भी अपनी रचनाओं श्रोताओं को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया। कवि सम्मेलन का संचालन वासीफ फारूकी ने किया। कार्यक्रम के संयोजक रमेशचंद्र मिश्र ने साहित्यकारों का स्वागत किया।