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Pratapgarh News: राष्ट्रप्रेम में थे मगन, गांव- गांव पैदा करते थे देशभक्ति की तरंग

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देश की आजादी की लड़ाई में बेल्हा के लाडले भी पीछे नहीं रहे। क्रांतिकारियों से जुड़कर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाते रहे। आजादी के दीवानों में एक नाम सदर तहसील क्षेत्र के पूरे भइया गांव के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरिहर प्रसाद त्रिपाठी का है। वह गांव-गांव जाकर लोगों में देशभक्ति की तरंग पैदा करते थे। कहीं स्लोगन के जरिए तो कहीं प्रेरक कहानियों के माध्यम से। कई बार उन्हें ब्रिटिश पुलिस की कार्रवाई भी झेलनी पड़ी, लेकिन इससे उनका उत्साह कम नहीं हुआ। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ अपना विरोध जारी रखा।
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हरिहर प्रसाद का जन्म 1900 में हुआ था। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय उनकी उम्र 19 वर्ष की थी। इस घटनाक्रम की खबर जब उनके गांव तक पहुंची तो उनके भीतर भी देशभक्ति की भावना उमड़ पड़ी। इस दौरान वह कुछ क्रांतिकारियों के संपर्क में भी आए। इसके बाद वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। उनकी शादी हो चुकी थी। परिजनों ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन घरवालों की एक नहीं सुनीं। वह युवाओं की टोली बनाकर गांव-गांव चौपाल लगाया करते थे। इस दौरान उनके भीतर देशभक्ति का जज्बा पैदा करते थे। क्रांतिकारियों की साहसिक कहानियां सुनाया करते थे। उनके पौत्र डाॅ.अनिल त्रिपाठी बताते है कि कहीं-कहीं देशभक्ति के नारों का स्लोगन व पंपलेट भी बांटते थे। इसकी भनक लगने पर ब्रिटिश पुलिस ने कई बार उनके खिलाफ कार्रवाई की व जुर्माना भी लगाया। वह कई बार जेल भी गए, लेकिन उन्होंने कदम पीछे नहीं खीचे। इधर, जब उनकी सक्रियता बढ़ने लगी तो पुलिस छापेमारी करने लगी। इसलिए उन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा।
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