जिले में नीलीक्रांति को जीवंत रखने का दायित्व अकेले कुंडा तहसील ने संभाल रखा है। मत्स्य पालन और उत्पादन के मामले में कुंडा ने सभी तहसीलों को पीछे छोड़ दिया है। तहसील में उत्पादक, तालाबों के पट्टों के लक्ष्य को भेदकर आगे निकल गए हैं। जिले में मत्स्य उत्पादन के लिए तमाम प्रयास किए जाते हैं, लेकिन योजनाएं धरातल पर उतरती नहीं दिखती हैं। इसके लिए लोगों में जागरूकता की कमी और इससे दूरी बनाना है। यही कारण है कि कुंडा को छोड़कर अन्य तहसीलों में मत्स्य पालन के लिए आवंटित होने वाले तालाबों को कोई लेने के लिए तैयार ही नहीं होता। इसके लिए विभाग को कई-कई बार विज्ञापन आदि भी जारी करना पड़ता है लेकिन कुंडा इन सबके विपरीत हर बार लक्ष्य को भेदकर आगे निकल जाता है। इस बार तहसील में 25 हेक्टेअर तालाबों के पट्टे का लक्ष्य दिया गया था। बावजूद इसके कुंडा में 29.133 हेक्टेअर तालाबों का पट्टा 28 लोगों को दिया जा चुका है। हर बार ऐसा होता है कि कुंडा तहसील का लक्ष्य पूरा होता जाता है। इसके अलावा उत्पादन व खपत भी यहां अधिक है। अधिक पैसे के लिए किसान उत्पादन को बाहर भी भेजते हैं। मत्स्य विभाग का दावा है कि कुछ साल पहले कुंडा में डेढ़ लाख मछलियां तालाबों में डाली जाती थीं। अब यह करीब एक करोड़ पहुंच गई है।
मत्स्य पालन को आधुनिक तरीके से किया जाए तो इसमें 50 हजार रुपये की लागत लगती है। इसमें पट्टा सहित मछलियों का चारा-पानी भी शामिल है। एक साल में एक हेक्टअर तालाब में 40 कुंतल मछलियां तैयार होती हैं। 40 कुंतल मछली दो लाख रुपये में बिकती है। यानी अगर 50 हजार रुपये की लागत निकाल दी जाए तो साल भर में सीधे डेढ़ लाख रुपये का फायदा होता है। किसी प्रकार की दुर्घटना हुई तो भी लाख-50 हजार रुपये बच जाते हैं।
क्षेत्र की जलवायु के अनुसार मत्स्य पालन में छह प्रजातियां तालाब में एक साथ डाली जाती हैं। इसमें तीन देशी व तीन विदेशी प्रजाति की है। देशी में रोहू, भाखुर, नैन व विदेशी में ग्रासकार, सिल्वरकार, कामनकार शमिल हैं। देशी की रोहू खाने में अच्छी होती है तो भाखुर की बेहतरीन पैदावार देती है। उधर विदेशी में ग्रासकार शाकाहारी मछली मानी जाती हैं। यह तालाब को घास-फूंस से साफ कर देती हैं। अनुराग सिंह जमेठी, जयंती प्रसाद परियावां, दशरथलाल कालाकांकर व राजकुमार सिहं गरीबपुर आदि इसके कारोबारी हैं। अशोक सिंह, मत्स्य निरीक्षक कुंडा ने बताया कुंडा में मत्स्य उत्पादन का बेहरीन स्कोप है। इसे और भी बढ़ाने की बात चल रही है। इसके किसानों को समय-समय पर नई जानकारियां दी जाती रहती हैं।