जिले के कई महाविद्यालयों में छात्र-छात्राओं को एनएसएस शिविर के नाम पर धोखा दिया जा रहा है। हर दिन केवल दो घंटे छात्र-छात्राओं को शिविर में रोका जाता है। उसके बाद उन्हें घर भेज दिया जाता है। कार्यक्रमाधिकारियों की लापरवाही की वजह से छात्र-छात्राएं शिविर में प्रतिभाग नहीं कर पा रहे हैं। जबकि कागजी कार्रवाई में छात्र-छात्राओं के शिविर में ठहराव की बात दिखाई जा रही है।
महाविद्यालय में अध्ययन करने वाले अधिकांश छात्र-छात्राएं दो वर्षीय राष्ट्रीय सेवा योजना में प्रतिभाग करते हैं। इनमें से तमाम छात्र-छात्राओं को एक वर्ष में सात दिवसीय शिविर में भाग लेने का मौका मिलता है। जबकि अच्छा प्रदर्शन करने वाले स्वयंसेवक और सेविकाओं को दोनों वर्ष शिविर करने का मौका मिलता है। इस शिविर के दौरान चयनित स्वयं सेविकाओं को सात दिन रुकना होता है, लेकिन जिले के कई महाविद्यालय संसाधन का अभाव बताकर शिविर की व्यवस्था नहीं करते। जबकि मानक के मुताबिक स्वयं सेवक और सेविकाओं का ठहराव अनिवार्य है। छात्र-छात्राओं का आरोप है कि शिविर के कार्यक्रमाधिकारी चयनित होने वाले स्वयंसेवक व सेविकाओं को सिर्फ महाविद्यालय बुला लेते हैं। इस दौरान वह केवल दो घंटे का प्रशिक्षण देेने के बाद उन्हें घर भेज देते हैं।
जिससे उनमें रोष है। उनका कहना है कि जिले में ही संचालित हो रहे तमाम महाविद्यालयों में एनएसएस शिविर लगाया जाता है। इस दौरान चयनित छात्र-छात्राओं को शिविर में ठहराव के लिए व्यवस्था की जाती है, लेकिन कार्यक्रमाधिकारियों की लापरवाही के चलते हम लोगों को इस योजना का सही से लाभ नहीं मिल पा रहा है। जिससे हम लोगों को प्रशिक्षण अधूरा ही रह जाता है। स्वयंसेवक और सेविकाओं ने संचालित हो रहे एनएसएस योजना की जांच की मांग की है। जिससे प्रशिक्षणार्थी सही से प्रशिक्षण प्राप्त कर सके।