जिले के हर उस गांव में ‘मानवरहित क्रासिंग हैं’, जहां से रेलवे लाइन गुजरी है। शार्टकट के चक्कर में ग्रामीणों ने मनमानी करते हुए ट्रैक पर मिट्टी-गिट्टी डालकर रास्ता बना लिया है। इस रास्ते से पैदल, बाइक सवार के अलावा चार पहिया वाहन भी गुजरते हैं। इसके चलते हादसे भी हो रहे हैं, लेकिन आरपीएफ व रेल विभाग के जिम्मेदार अफसरों की नींद नहीं खुल रही।
जिले में तीन रेलखंड से ट्रेनों का संचालन होता है। जिसके दायरे में सैकड़ों गांव आते हैं। लखनऊ-इलाहाबाद रेलखंड वाया कुंडा हरनामगंज, फैजाबाद-इलाहाबाद रेलखंड और वाराणसी-लखनऊ रेलखंड से हर दिन ट्रेनों का आवागमन बना रहता है। इन रेलखंडों के किनारे बसे गांवों के लोगों ने शार्टकट के चक्कर में रेलवे लाइन पर मिट्टी व गिट्टी डालकर खुद ही रास्ता तैयार कर लिया है। जबकि रेल विभाग हर दिन ट्रैक का निरीक्षण करता है। खतरों के बावजूद लोग जल्दी के चक्कर में जिंदगी से खिलवाड़ करते हैं। दोपहिया के साथ ही लोग चार पहिया वाहन लेकर गुजरते हैं।
भले ही इन रास्तों का जिक्र रेल विभाग के अभिलेखों में नहीं है, लेकिन ग्रामीणों की सहूलियत के लिए पक्का रास्ता भी रेलवे लाइन तक कहीं-कहीं बनाया गया है। कुछ जगह कच्चा रास्ता है। जिससे होकर लोग हर दिन आते-जाते हैं। जगेशरगंज रेलवे स्टेशन के करीब तो आए दिन स्कूली बच्चों से भरी मैजिक मानव रहित क्रासिंग पार करती है। कोहड़ौर थाना क्षेत्र के नरहरपुर रेलवे लाइन क्रासिंग से हर दिन वाहनों का आवागमन होता रहता है। ट्रेन रूपी मौत को सामने देखने के बाद भी लोग लाइन पार करते नजर आते हैं। नगर कोतवाली के श्रीकांतपुर, जोगापुर, घाटमपुर, दानपुर, विश्वनाथगंज, खरवई में मानव रहित क्रासिंग पार करने के लिए सुबह से लेकर शाम तक ग्रामीणों का रेला लगा रहता है। रानीगंज के आमापुर और कुंडा कोतवाली क्षेत्र में भी बहुत सी मानव रहित क्रासिंग ग्रामीणों ने बना रखी है। इसके बावजूद आरपीएफ और रेल विभाग के अफसर अनजान बने रहते हैं। इस वजह से आए दिन हादसे होते रहते हैं।
रानीगंज थाना क्षेत्र के आमापुर बेर्रा में मानधाता थाना क्षेत्र के पर्वतपुर से 11 मई 1993 को बारात आई थी। रस्म पूरी होने के बाद दूसरे दिन 12 मई को बारात लौट रही थी। बाराती जीप पर सवार थे। आमापुर बेर्रा क्रासिंग के पास जीप नीलांचल एक्सप्रेस से टकरा गई। जिससे जीप में सवार 14 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस हादसे के बाद मानव रहित क्रासिंग बंद करने की कवायद रेल विभाग ने प्रारंभ की, लेकिन कुछ नहीं हो सका। अभी भी भारी वाहनों को छोडक़र आमापुर मानव रहित क्रासिंग से दर्जनों गांवों के लोगों का आवागमन होता रहता है।
मानधाता थाना क्षेत्र के सतइसा गांव में मानव रहित रेलवे क्रासिंग पर तीन माह पूर्व बड़ा हादसा होने से बच गया था। रात के अंधेरे में सामने से ट्रेन आते देख चालक मैजिक ट्रैक पर ही छोडक़र भाग निकला था। यह तो गनीमत रही कि मैजिक अपने आप ट्रैक से दूर हो गई। जिससे हादसा बच गया। कुछ दिनों पहले पृथ्वीगंज के करीब एक बाइक सवार रेलवे लाइन पार कर रहा था। सामने ट्रेन आते देख बाइक छोडक़र भाग निकला। ट्रेन की चपेट में आने से बाइक के परखचे उड़ गए थे।
चिलबिला रेलवे स्टेशन के पास मंगलवार की रात ट्रक के नीलांचल एक्सप्रेस से टकराने के बाद आरपीएफ और रेल विभाग की कुंभकर्णी नींद खुली। बुधवार को आरपीएफ ऐसी क्रासिंगों को चिन्हित करने के लिए रेलवे लाइन पर भागदौड़ करती नजर आई। रेल विभाग के आईओडब्ल्यू भी मानव रहित रेलवे क्रासिंग की रिपोर्ट तैयार करने में जुट गए।
जिले में केवल तीन मानव रहित रेलवे क्रासिंग हैं। जिनके लिए अंडरपास की व्यवस्था हो रही है। गांवों में लोग खुद मिट्टी डालकर रास्ता बना लेते हैं। जिसकी रोकथाम के लिए ट्रैक के दोनों ओर खुदाई कराकर गड्ढा बनाया जाता है। ऐसे स्थानों को चिह्नित कर फिर से बंद कराया जाएगा।
आरएन सचान, सहायक मंडल अभियंता।