गबन के आरोपी बैंक मैनेजर को जेल से अस्पताल लाकर आठ महीने तक प्राइवेट वार्ड में भर्ती कराकर इलाज करने और हत्या के आरोपी कुंडा चेयरमैन गुलशन यादव को 13 महीने तक एसआरन में भर्ती करने के मामले में अस्पताल से जेल तक लीपापोती शुरू हो गई है। अमर उजाला में खबर छपने के बाद दोनों बंदियों को जेल भेज दिया गया, लेकिन यह पता लगाने की कोशिश नहीं की गई कि इसके लिए दोषी कौन है। जिला प्रशासन ने भी इस मामले में चुप्पी साध ली है।
मामले को दबाने के लिए अस्पताल से जेल तक लीपापोती शुरू हो गई है। अफसर अपनी गर्दन बचाने के लिए एक-दूसरे पर तोहमत मढ़ रहे हैं।जिला कारागार में निरुद्ध बंदी इलाज के नाम पर मौज काटते रहे। जनपद कारागार से इलाज के नाम पर आठ माह से गबन के आरोपी बैंक प्रबंधक सुनील चुतर्वेदी जिला अस्पताल के प्राइवेट वार्ड में रुके। वहीं कुंडा के चेयरमैन गुलशन यादव भी 13 माह से इलाज के नाम पर एसआरएन में भर्ती हो गए। वह अपने चालक के नाम से बुक प्राइवेट वार्ड में रहते थे। डाक्टर भी उनका बखूबी इलाज किया करते थे। सेटिंग के खेल में नियम कानून ताक पर रखकर दोनों अस्पतालों में इलाज कराते रहे।
खास बात यह कि विचाराधीन आम बंदी तड़पता रहे, लेकिन उन्हें इलाज के लिए बाहर भेजना जेल प्रशासन बेहतर नहीं समझता। चर्चाओं पर यकीन करें तो जेल प्रशासन और अस्पताल में तैनात डाक्टरों की सेटिंग से बंदी मरीज लंबे समय तक इलाज कराते रहे। इतने दिनों तक अस्पताल प्रशासन से लेकर जेल प्रशासन दोनों केवल कागजी औपरचारिकता निभाते रहे। ताकि मामला खुलने पर उनकी गर्दन बच सके। मामला सुखर्यों में आने के बाद सब अपनी गर्दन फंसाने के लिए एक दूसरे पर तोहमत लगाने के अलावा लीपापोती करने में जुट गए हैं। नियम कानून को दरकिनार करने वाले दोषियों पर कार्रवाई के बजाय मामला संज्ञान में आने के बाद भी जांच कराने को तैयार नही है।
जेल प्रशासन कम जिम्मेदार नहीं
विचाराधीन बंदियों को इलाज के नाम पर सालों से अस्पताल में रहने के बाद भी जेल प्रशासन केवल कागजी घोड़ा दौड़ाता रहा। हकीकत जानते हुए भी जेल अफसर मौन धारण किए रहे। सेटिंग के खेल में गबन के आरोपी बैंक प्रबंधक और कुंडा नगर पंचायत के चेयरमैन गुलशन यादव नियम कानून को ताक पर रखकर अस्पताल में इलाज कराते रहे। अब भी जेल प्रशासन अपनी गर्दन फंसने से बचाने के लिए अभिलेखों को सामने लाने से कतरा रहा है।
प्रभारी डीएम ने साधी चुप्पी
विचाराधीन बंदियों को नियम कानून ताक पर रखकर हो रहे इलाज का मामला सुर्खियों में आने के बाद भी प्रभारी जिलाधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। प्राय: छोटे-छोटे मामलों में हस्तक्षेप करने वाले सीडीओ महेंद्र बहादुर सिंह मौजूदा समय में प्रभारी जिलाधिकारी हैं। जेल के विचाराधीन बंदियों के मनमाने इलाज कराने की छूट के बाद भी उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। इसके पीछे कोई दबाव है या फिर वह इस पचड़े में फंसना ही नहीं चाहते। कई बार फोन पर बात करने का प्रयास किया गया, लेकिन काल रिसीव नहीं हुुई।