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सत्ता का संतुलन साधने की कला में बेजोड़ हैं राजाभैया

Sun, 25 Mar 2018 12:02 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
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निर्दलीय विधायक राजा भैया व सीएम योगी आदित्यनाथ। - फोटो : amar ujala
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राज्यसभा चुनाव में अपना मत सपा को देने और अपने नजदीकी विधायक का वोट भाजपा को दिलाने की चर्चाओं के बीच एक बार फिर साबित हो गया है कि सत्ता का संतुलन साधने की कला में राजाभैया का कोई जोड़ नहीं है। राजनीति में कदम में रखने के बाद बसपा को छोड़कर सभी सरकारों में राजाभैया ने अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। भाजपा नेताओं से उनकी करीबी जगजाहिर है। सपा के साथ-साथ उन्होंने कांग्रेस नेताओं को भी साधे रखा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ भी वह मंच पर नजर आ चुके हैं।
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कुंडा से लगातार छठीं बार निर्दल विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजाभैया पर शुरुआत से ही जब तब गंभीर आरोप लगते रहे, लेकिन कभी उनकी सियासत पर इसका असर नहीं पड़ा। भाजपा-सपा समेत कांग्रेस में भी राजाभैया ने अपनी पैठ बनाए रखी। अब तक की राजनीति में राजाभैया को सिर्फ बसपा सुप्रीमो मायावती का ही धुर विरोधी माना जाता रहा है।

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी उनके बेहद करीबी माने जाते हैं। खुद राजाभैया भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि राजनाथ सिंह से उनके बेहद पुराने और आत्मीय संबंध हैं। राजनाथ हर मुसीबत के समय व्यक्तिगत तौर पर उनके साथ खड़े रहे हैं। राजाभैया निर्दल विधायक रहते हुए 1998 मेें पहली बार भाजपा की कल्याण सिंह सरकार में मंत्री बने। इसके बाद राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में भी मंत्री बने रहे। 2002 में मायावती से विवाद के बाद वह जेल गए और उन पर पोटा लगा। 2002 में सपा की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने उन पर से पोटा हटा लिया।
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तभी से वह सियासत में सपा के साथ आ गए। राष्ट्रपति के चुनाव के दौरान भी राजाभैया ने भाजपा प्रत्याशी रामनाथ कोविंद का खुलकर समर्थन किया। तब उन्होंने कहा था कि रामनाथ कोविंद से व्यक्तिगत संबंध होने के कारण उन्होंने उनके पक्ष में मतदान किया है। खुद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद 2014 में बेंती कोठी में आयोजित रामकथा के दौरान दो दिन रुके थे। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पांडेय भी राजाभैया के बेहद नजदीक हैं।

भाजपा की फायरब्रांड नेता उमा भारती भी कई बार बेंती आ चुकी हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता और वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीमकोर्ट में राजाभैया के मामले देखते हैं। इसके अलावा कांग्रेस के राजीव शुक्ला से भी उनकी मित्रता है। यूपीए सरकार में मंत्री रहे जितिन प्रसाद भी उनके करीबियों में से हैं तो राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधराराजे सिंधिया भी दूर की रिश्तेदार हैं।

सपा में विवाद के दौरान भी अखिलेश-मुलायम दोनों के बने रहे खासमखास
पोटा हटने के बाद उत्तर प्रदेश की सियासत में मुलायम सिंह यादव और राजाभैया एक-दूसरे के बेहद नजदीक आ गए। 2012 में जब पूर्ण बहुमत के साथ सपा सत्ता में आई तो राजाभैया एक बार फिर कैबिनेट मंत्री बने। हालांकि इस दौरान मुख्यमंत्री रहे अखिलेश यादव से राजाभैया के मतभेद की खबरें भी आईं। चर्चा रही कि कई मामलों को लेकर अखिलेश राजाभैया से नाराज थे। 2 मार्च 2013 को कुंडा में सीओ जियाउल हक की हत्या में नाम आने के बाद राजाभैया ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
हालांकि सीबीआई से क्लीन चिट मिलने के बाद वह फिर सपा सरकार में मंत्री बने, लेकिन इसके बाद भी अखिलेश से उनके रिश्ते सहज नहीं हो सके। विवाद बढ़ते देख खुद मुलायम सिंह यादव ने पहल की और अखिलेश के साथ राजाभैया से मिलने उनके आवास पहुंचे। इसके बाद राजाभैया मुलायम के साथ-साथ अखिलेश यादव के भी करीबी हो गए। 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सपा में हुए बवाल के बाद भी राजाभैया ने चुप्पी साधे रखी और वह मुलायम और अखिलेश दोनों के खासमखास बने रहे। राजाभैया खुद कहते हैं कि उनके दोनों के साथ करीबी रिश्ते हैं।

सीएम योगी से भी है पारिवारिक संबंध
राजाभैया भले ही सियासत में अब सपा के साथ हों, लेेकिन भाजपा के सीएम योगी आदित्यनाथ भी उनके बेहद करीब हैं। विहिप से जुड़े राजाभैया के पिता उदय प्रताप सिंह के गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर दिग्विजयनाथ से उदय प्रताप के गहरे ताल्लुकात रहे। इसके बाद महंत योगी आदित्यनाथ पीठाधीश्वर बने। तब से अब तक पारिवारिक संबंध चले आ रहे हैं। खुद राजाभैया भी मानते हैं कि योगी से उनके नजदीकी रिश्ते हैं। वह उनके साथ मंच पर भी नजर आ चुके हैं।

मायावती से है पुरानी अदावत
बसपा मुखिया व प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से पूर्व मंत्री व कुंडा के निर्दल विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजाभैया की पुरानी अदावत है। राजनीति में दोनों एक-दूसरे के धुर विरोधी हैं। 2002 में भाजपा-बसपा की गठबंधन की सरकार बनने के बाद राजाभैया ने मायावती को समर्थन नहीं दिया था। इसके बाद सरकार गिरी और बसपा के विधायक सपा में शामिल हुए तो इसके लिए भी राजाभैया को ही जिम्मेदार माना गया। राजनीतिक विरोध के कारण ही राजाभैया को मायावती ने जेल तक भेजवा दिया। उन पर और उनके पिता पर पोटा तक लगा दिया गया। हालांकि बाद में सपा सरकार ने पोटा वापस ले लिया।

वर्ष 1993 में राजनीति में कूदे राजाभैया ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। निर्दल चुनाव लड़ने वाले पूर्व मंत्री रघुराज प्रताप सिंह राजाभैया का भी विवादों से काफी पुराना नाता रहा है। 1998 मेें पहली बार भाजपा की कल्याण सिंह सरकार में वह मंत्री बने। रामप्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में भी राजाभैया मंत्री बने रहे। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा और बसपा गठबंधन की सरकार बनी। बसपा मुखिया मायावती मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन राजाभैया को मंत्रीमंडल से दूर रखा।

भाजपा सहयोगी दल होने के कारण बसपा के समर्थन में थी। 2002 के चुनाव के दौरान ही राजाभैया पर तत्कालीन सपा प्रत्याशी मो.शमी ने यह आरोप लगाया था कि राजाभैया के डर के कारण कुंडा और बाबागंज में मतदाता बूथों तक नहीं पहुंचे। इसके बाद राजाभैया पर बसपा विधायक पूरन सिंह बुंदेला को धमकाने का आरोप लगाकर लखनऊ में मुकदमा दर्ज कराया गया। इसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई। राजाभैया की गिरफ्तारी के विरोध में चौथे दिन धरना देने गए एमएलसी अक्षय प्रताप सिंह गोपालजी को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। इसके बाद अलग-अलग 35 मुकदमे बसपा सरकार में दर्ज हुए।

जिसमें हत्या, डकैती, अपहरण समेत संगीन अपराध शामिल थे। 26 जनवरी वर्ष 2003 में भदरी राजमहल से पुलिस ने राजाभैया के पिता उदय प्रताप सिंह को गिरफ्तार करते हुए एके 47 की बरामदगी दिखाई। राजाभैया व उनके पिता के साथ ही एमएलसी गोपालजी पर पोटा लगा दिया। राजाभैया के समर्थन में आगे आने वालों पर बसपा सरकार सख्त कार्रवाई करती रही। वर्ष 2003 में ही बसपा सरकार गिर गई।

कुछ दिनों बाद सपा की सरकार बनी और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने पोटा हटाने का फैसला लिया। वर्ष 2007 में फिर बसपा की सरकार बनी। मायावती मुख्यमंत्री बनीं। 2011 के ब्लाक प्रमुख चुनाव के दौरान राजाभैया पर कुंडा कोतवाली में फायरिंग, बीडीसी सदस्यों को अगवा करने का मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने गैंगस्टर भी लगा दिया। इस मामले में भी वह चार माह तक जेल में रहे। बसपा सरकार ने राजाभैया के बेंती तालाब को पक्षी विहार घोषित कर दिया था।

राज्यसभा के मतदान के पहले राजाभैया के ट्वीट से गरमाई सियासत
प्रतापगढ़। राज्यसभा चुनाव के दिन पूर्व मंत्री व कुंडा के निर्दल विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजाभैया के एक ट्वीट ने जिले का सियासी पारा गरमा दिया। इस ट्वीट के सियासी मायने निकाले जाने लगे। लोग टेलीविजन से माजरा समझने का प्रयास करने लगे। कुछ लोग तो राजाभैया के भाजपा के साथ जाने के कयास भी लगाने लगे।

प्रदेश के पूर्व मंत्री व कुंडा के निर्दल विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजाभैया शुक्रवार को लखनऊ स्थित अपने आवास पर मौजूद थे। उनके साथ बाबागंज विधायक विनोद सरोज भी थे। राज्यसभा की वोटिंग शुरू होने के बाद राजाभैया ने एक ट्वीट किया। जिसमें उन्होंने लिखा, ना मैं बदला हूं न मेरी राजनीतिक सोच बदली है, अखिलेश के साथ होने का यह मतलब नहीं है कि हम बसपा के साथ हैं। राजाभैया के इस ट्वीट के बाद सपा व बसपा में हलचल मच गई।

वहीं जिले का भी अचानक सियासी पारा चढ़ गया। इस ट्वीट का मतलब निकाला जाने लगा। लोग कयास लगाने लगे कि राजाभैया भाजपा के समर्थन में तो नहीं हैं। हालांकि मत देने के लिए जाने से पहले राजाभैया ने साफ कर दिया कि वह अखिलेश यादव के साथ हैं और सपा प्रत्याशी के समर्थन में वोटिंग करेंगे।


बाबागंज विधानसभा में भी चलता है राजा भैया का सिक्का
बाबागंज विधानसभा क्षेत्र से भले ही विनोद सरोज विधायक हों, लेकिन यहां भी सिक्का राजा भैया का ही चलता है। बिना राजा भैया के कहे विनोद सरोज एक कदम भी नहीं बढ़ाते। बाबागंज विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए भले ही विनोद सरोज उम्मीदवार होते हैं लेकिन यहां भी उनकी जीत में राजा भैया की ही भूमिका होती है। राजा भैया की बदौलत ही पिता की विरासत विनोद संभाल रखे हैं। विनोद भी राजा भैया को अपना राजनैतिक गुरु मानते हैं।

जिले की बाबागंज विधानसभा कभी विहार के नाम से जानी जाती थी। कुंडा से निर्दल चुनाव जीतते आ रहे रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया ने अपने करीबी सेवानिवृत्त सैनिक रामनाथ सरोज को वर्ष 1996 में विहार विधानसभा से चुनाव लड़ाया। वह रिकार्ड मतों से जीत हासिल कर निर्दल विधायक बने। राजा भैया के वफादार करीबियों में रामनाथ सरोज व उनके परिवार की गिनती होती थी। दूसरी बार फिर रामनाथ सरोज विधायक चुने गए।

उनके निधन के बाद पिता की वरासत संभालने के लिए राजा भैया ने विनोद सरोज को मौका दिया। वर्ष 2007 में विनोद सरोज को राजा भैया ने विहार से निर्दल चुनाव लड़ाया। जीत हासिल कर विनोद कम उम्र के विधायक बने। राजा भैया की रणनीति और मेहनत से विनोद वर्ष 2012 में बाबागंज विस के विधायक चुने गए।

यहां भले ही विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए विनोद सरोज पर्चा भरते हैं लेकिन असली लड़ाई राजा भैया को ही लड़नी पड़ती है। राजा भैया के चेहरे पर विनोद जनता के बीच जाते हैं। 2017 के चुनाव में राजा भैया की कृपा से विनोद सरोज ने हैट्रिक मारा। बिना राजा भैया के कहे विनोद सरोज एक कदम भी नहीं बढ़ाते। शुक्रवार को विधायक विनोद सरोज ने राज्यसभा के उसी प्रत्याशी को अपना मत दिया होगा। जिसके लिए राजा भैया ने कहा होगा।

मायावती के प्रेस कांफ्रेंस के बाद बदलते नजर आ रहे समीकरण
राज्यसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी की हार के बाद जारी शनिवार को दिन भर हुई सियासी उठापटक के बीच अब नए राजनीतिक समीकरण बनते नजर आ रहे हैं। चुनाव से पहले राजा भैया राजा भैया का ट्वीट कर यह कहना कि वह अखिलेश के साथ हैं इसका अर्थ नहीं कि वह बसपा के साथ हैं। फिर सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा राजा भैया को धन्यवाद देने के दूसरे दिन बसपा मुखिया मायावती ने प्रेस कांफ्रेंस कर अखिलेश यादव पर निशाना साधा। मायावती के यह कहने कि अखिलेश राजा भैया के जाल में फंस गए। इसके बाद अखिलेश यादव ने राजा भैया को धन्यवाद देने वाला बयान ट्वीटर से हटा लिया। इसके राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। गठबंधन की सियासत में कई समीकरण बनते बिगड़ते नजर आ रहें हैं।
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