तेजी से फैल रहे कोरोना वायरस ने गांव की फिजाओं में भी दहशत घोल दी है। दिल्ली, मुंबई, गुजरात से आने वाले लोगों से ग्रामीण दूरी बना रहे हैं। शासन ने ऐसे लोगों को होम क्वारंटीन रहने का निर्देश दिया है, लेकिन घरवाले भी उनसे दूरी बना रहे हैं। उनके लिए घर के दरवाजे बंदकर बाहर बाग या खेत में क्वारंटीन होने के लिए कह रहे हैं। ऐसे में परदेसियों को बाहर ही क्वारंटीन अवधि पूरी करनी पड़ रही है।
मुंबई से आए परदेसियों ने बगीचे में डाला डेरा
मंगरौरा ब्लाक के मंगापुर के बरियार का पुरवा गांव निवासी सीताराम के बेटे संजय कुमार, सजनलाल, शोभनाथ मुंबई में रहते थे। वहां सभी प्राइवेट कंपनी में कार्य करते थे। उनके साथ उनका परिवार भी रहता था। कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन से कंपनियां बंद हो गईं। 50 दिन लॉकडाउन के दौरान सभी ने मुंबई में बिताए। जब वहां संक्रमण का खतरा बढ़ने लगा तो सभी ने गांव आने का मन बनाया।
सभी वाहन बुक कर तीन दिन में गांव पहुंचे। यहां घरवालों ने होम क्वारंटीन होने के बजाए उन्हें बाहर क्वारंटीन होने को कहा। संजय, सजनलाल व शोभनाथ के नौ सदस्यीय परिवार ने घर से थोड़ी दूर पर स्थित बगीचे में डेरा जमाया। टेंट हाउस से चारपाई आदि की व्यवस्था की है। बगीचे में ही सभी भोजन बनाकर क्वारंटीन की अवधि काट रहे हैं। उनका कहना है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव के लिए यह बेहद जरूरी है।
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- फोटो : pratapgarh
खलिहान में बीता रहे क्वारंटीन अवधि, घर से आ रहा खाना
बेलखरनाथधाम के शेखपुर अठगवां गांव निवासी जमुना प्रसाद का बेटा लालमुनि गुप्ता रोजी-रोटी के सिलसिले में गुजरात गया था। वहां लोहे की फैक्ट्री में काम करता था। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के चलते 25 मार्च को लॉकडाउन के निर्णय के बाद कंपनियां बंद हो गईं। करीब 47 दिन लॉकडाउन में बीताने के बाद जब उसके सामने आर्थिक संकट गहराने लगा तो वह ट्रक से किसी तरह तीन दिन का सफर तय कर घर पहुंचा।
घरवालों ने उससे दूरी बनाए रखी। होम क्वारंटीन करने के बजाए उसे 14 दिनों तक बाहर क्वारंटीन रहने को कहा। घरवालों ने थाली, बर्तन, बाल्टी, लोटा, चारपाई, मच्छरदानी देकर खलिहान के पास लालमुनि को क्वारंटीन कर दिया। खलिहान के पास पेड़ की छांव के नीचे लालमनि क्वारंटीन अवधि के आठ दिन बीता चुके हैं। घर से चाय-नाश्ता व खाना परिजन पहुंचा रहे हैं। लालमनि का कहना है कि घरवालों ने एहतियातन यह निर्णय लिया है।
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बगीचे में दिन, मचान पर काटते हैं रात
रानीगंज के भटपुरवा निवासी अजय मिश्र में मुंबई में रहकर व्यवसाय करते थे। लॉकडाउन के चलते उनका कामकाज ठप हुआ तो उन्होंने गांव आने का मन बनाया। वाहन बुक कर वह गांव आए तो घर के बजाए उन्होंने बगीचे में रहने का निर्णय लिया। परिवारीजनों ने भी उनके निर्णय का समर्थन किया। दिनभर वह बगीचे में रहते हैं, जबकि रात में खेत में बने मचान पर सोते हैं।
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सब्जियों की रखवाली संग मचान पर काट रहे दिन
मंगरौरा ब्लाक के मंगापुर गांव निवासी रामदेव का बेटा शिवबहादुर वर्मा व रामदास का बेटा देवराज मुंबई में एक इलेक्ट्रानिक कंपनी मेें काम करते थे। दोनों एक साथ किराए के कमरे मेें रहते थे। लॉकडाउन के चलते कंपनी बंद हो गई। करीब 45 दिन लॉकडाउन में काटने के बाद जब उनके सामने आर्थिक संकट गहराया तो दोनों ने गांव की राह थाम ली।
ट्रक से दोनों गांव पहुंचे। यहां परिजनों ने उन्हें घर के बाहर ही क्वांरटीन अवधि पूरी करने को कहा। ऐसे में दोनों ने घर से थोड़ी दूर सब्जी के खेत में बने मचान पर रहने का निर्णय लिया। दोनों मचान पर रहते है। क्वारंटीन अवधि बीताने के साथ ही वह सब्जियों की रखवाली भी कर रहे हैं।