जिले के मेडिकल स्टोरों पर जहां मॉस्क की कालाबाजारी हो रही है, वहीं महिला स्वयं सहायता समूहों से तैयार पांच हजार मॉस्क डंप पड़े हैं। तीन लेयर के गुणवत्तायुक्त मॉस्क को अधिकारी खरीदने के बजाए मेडिकल स्टोरों के मॉस्क खरीदना अधिक पसंद कर रहे हैं। जबकि शासन ने सभी विभागाध्यक्षों को आदेश जारी कर महिला स्वयं सहायता समूहों से ही मॉस्क खरीदने को कहा है।
शासन ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित महिला स्वयं सहायता समूहों को तीन लेयर का कपड़ा मुहैया कराकर भारी संख्या में मॉस्क तैयार करने को कहा था। विभागीय अधिकारियों को महिलाओं के हाथों से तैयार मॉस्क को ही खरीदने को कहा था। शासन के इस आदेश से दो फायदे हुए।
एक तो यह कि लॉकडाउन में गांव की महिलाओं को रोजगार मिल गया। दूसरे कम लागत में कर्मचारियों को अच्छा मॉस्क मिल जाएगा। मगर विभागीय अधिकारी महिलाओं के इस प्रयास को पलीता लगा रहे हैं।
बेलखरनाथधाम, मानधाता, बिहार ब्लाक की महिला स्वयं सहायता समूहों ने लगभग पांच हजार मॉस्क तैयार कर रखा है। मगर इसे खरीदने वाला अब कोई नहीं है। इससे गांव की महिलाएं जहां बेरोजगार हो गई हैं, वहीं मॉस्क बनाने का कार्य भी ठप हो गया है।
13 और 18 रुपये है दर
महिलाओं के हाथों से निर्मित होने वाला तीन लेयर का मॉस्क दो प्रकार का है। पॉपलीन से बने मॉस्क 13 रुपये प्रति पीस और सूती कपड़े से निर्मित मॉस्क 18 रुपये की दर से बेचे जाने हैं। दोनों मॉस्क के लिए कपड़े शासन ने ही मुहैया कराए थे।
पुलिस और बैंक ने ही खरीदा है मॉस्क
पुलिस विभाग ने 2500, ग्रामीण बैंक ने 5,000, सांसद कौशांबी विनोद सोनकर ने 4,500 मॉस्क की ही खरीदारी की है। जबकि शासन के निर्देश पर भारी संख्या में मॉस्क तैयार करने का अभियान प्रारंभ किया गया था।
तीन लेयर का गुणवत्तायुक्त मॉस्क महिलाओं ने तैयार किया है, मगर विभागीय अधिकारी लेने को तैयार नहीं हैं। अभी लगभग पांच हजार मॉस्क तैयार हैं। अगर विभागीय अधिकारी मॉस्क नहीं लेंगे तो इन्हें तैयार कराना बेकार है।
ओपी यादव, डीसी, स्वत: रोजगार