दिवाली पर मिट्टी का जतोला, घंटी और तोता। एक दशक पहले तक दीप पर्व आने के पखवारे भर पहले से कुम्हारों की चाक पर तैयार ये खिलौने बाजारों में छा जाते थे। डिमांड इतनी की दुकानदार मांग पूरी नहीं कर पाते थे, लेकिन चाइनीज खिलौने की दखल के बाद मिट्टी के ये खिलौने गुम हो गए। अब बाजार में कहीं ढूंढने से भी नहीं मिल रहे हैं। दीपावली पर खिलौनों का बाजार चाइनीज सामानों से पटा पड़ा है। तमाम विरोध के बावजूद चाइनीज खिलौने की बिक्री में मामूली गिरावट आई है।
दिवाली के पर्व आने के एक माह पहले से ही चाक पर मिट्टी का खिलौना, बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के चाक दिन रात चलने लगते। इस मेहनत से परिवार के लिए साल भर का खर्च जो निकालना होता था। खास बात यह रहती थी कि जहां कुम्हार बड़ों के पूजा अर्चना के लिए दियाली, लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा व ग्वालिन बनाते थे। वहीं बच्चों के लिए कुम्हार खिलौना बनाना नहीं भूलते थे। एक दशक पहले मिट्टी के खिलौने दिवाली पर बच्चों की पसंद होते थे। वे पर्व के पहले खिलौना खरीदने के लिए परिजनों से जिद भी करते थे।
कुम्हार अपनी चाक पर गौरैया, तोता, मैना के साथ ही जतोला, तराजू, घंटी, जोकर, राजा समेत अन्य खिलौने बनाया करते थे। जब से मार्केट में चाइनीज गिफ्ट व खिलौनों आ गए, तब से बच्चों की पसंद भी बदलती जा रही है। अब बच्चे चाइनीज खिलौने पसंद कर रहे हैं। चाइनीज खिलौने 10 से लेकर हजार रुपये तक में मौजूद हैं। कारोबारी राजू अग्रवाल, महेश गुप्ता, दिनेश वार्ष्णेय आदि की मानें तो विरोध के बाद भी चाइनीज खिलौने की बिक्री में मामूली कर्मी आई है।
महंगाई ने भी कर दिया है मजबूर
जनपद के हर सातों विधानसभा में लगभग एक लाख से अधिक कुम्हारों का परिवार रहता है। जो मिट्टी के बर्तन बनाकर परिवार का गुजर बसर करते हैं। महंगाई डायन ने ऐसे परिवारों को इस व्यवसाय से दूर कर दिया है। किसी जमाने में मुफ्त में मिलने वाली मिट्टी अब डेढ़ हजार रुपये ट्राली मिलती है। वह भी खभोर, गनईडीह, सुलतानपुर समेत कुछ चुनिंदा स्थानों पर ही मिलती है। मिट्टी का बर्तन व खिलौना बनाने में दोमट व चिकनी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। मिट्टी, ईंधन का दाम अधिक होने के कारण बाजार में उतनी कीमत ग्राहक देने को तैयार नहीं होते। नतीजा मेहनत के बाद भी परिवार की लागत भी कभी -कभी नहीं निकल पाती।