जिले में मतदान प्रतिशत घटने का मुख्य कारण बीएलओ की मनमानी माना जा रहा है। तहसीलों से बीएलओ को मिलने वाली वोटर पर्ची मतदाताओं के घर-घर नहीं बांटी गई। इससे वह मतदाता वोट नहीं डाल पाए, जिसका मतदाता सूची में नाम था। जिला प्रशासन ने इस वर्ष प्रत्याशियों का बस्ता लगाने से भी मना कर दिया था। ऐसी दशा में अधिकांश मतदाताओं को यह जानकारी नहीं हो पाई कि वोटर लिस्ट में उसका नाम है कि नहीं।
जिले का मतदान प्रतिशत इतना कम रहा कि अधिकारी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं। मगर यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है कि महीने भर चले जागरूकता अभियान के बावजूद मतदान प्रतिशत में बढ़ोत्तरी नहीं हुई। दरअसल विधानसभा चुनाव में जिला प्रशासन ने बूथ के बाहर प्रत्याशियों का बस्ता लगाने पर पूरी तरह रोक लगा रखा था। इससे किसी भी पार्टी के प्रत्याशी के समर्थक बूथ के बाहर नजर नहीं आए। जिला प्रशासन की ओर से जो व्यवस्था की गई थी, उसके मुताबिक प्रत्येक मतदान केंद्रों के बीएलओ मतदाताओं के घर-घर वोटर पर्ची बाटेंगे, जिसे लेकर मतदाता सीधे बूथ पर जाएंगे। जिले के लेखपालों, शिक्षकों और आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों को बीएलओ बनाया गया था।
गंवई राजनीति में उलझे बीएलओ ने खेल करते हुए अपने मतदाताओं को वोटर पर्ची ही नहीं दिया। आसपुर देवसरा, मंगरौरा, संडवा चंद्रिका, मानधाता, लक्ष्मणपुर, शिवगढ़, रामपुरखास, कुंडा और बाबागंज ब्लाकों से अधिकांश शिकायतें भी आती रहीं, मगर जिला प्रशासन ने इन शिकायतों को दरकिनार कर दिया। इसका परिणाम यह रहा कि जिले में जहां मतदान 65 प्रतिशत से अधिक माना जा रहा था, वहीं घटकर 55.84 पर पहुंच गया। जो वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में हुए मत प्रतिशत से सिर्फ 2.14 प्रतिशत अधिक है। सीआरओ राम सिंह वर्मा ने बताया कि वोटर पर्ची नहीं मिलने की जो शिकायतें आई हैं, अब उसकी जांच कराकर वास्तविकता खंगाली जाएगी कि बीएलओ ने पर्ची बांटी थी कि नहीं। अगर बीएलओ ने लापरवाही की होगी, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।