शहर की आबादी बेतहाशा बढ़ रही है। दायरा भी बढ़ा, लेकिन आम आदमी के आवास की जरूरत नहीं पूरी हो सकी। जिले में आवास विकास परिषद ने 1982 के बाद सस्ते आवास बनाने की दिशा में कोई पहल नहीं की है। इससे गांव से शहर आने वाले लोग भी किराए पर रहने को मजबूर हैं। प्रत्येक जिले में लोगों को रिहायसी मकान मुहैया कराने के लिए आवास विकास परिषद कार्यालय की स्थापना की गई है। कम लागत और किश्त पर मिलने वाला मकान जहां आम आदमी को राहत देता है, वहीं नौकरी पेशा और छोटे व्यापारी भी खरीदने में सक्षम होते हैं। जिले में 1980 में आवास विकास परिषद कार्यालय खोला गया। मीराभवन चौराहे के निकट 1982 में ए, बी, सी ब्लाक में सैकड़ों भवनों को तैयार कर लोगों को कब्जा दिलाया। मगर इसके बाद से आवास विकास परिषद ने इस दिशा में कोई पहल नहीं की। इससे शहर के सामान्य परिवारोें को निजी आवास नहीं नसीब हो रहा है।
अगर शहर की आबादी पर प्रकाश डालें तो वर्ष 1981 में 56,253 थी, वहीं वर्ष 2011 में 76,450 हो गई है। वर्तमान में आलम यह है कि गांव के लोग शहर की ओर से तेजी से पलायन कर रहे हैं। वह चाहे रोजगार के उद्देश्य से या बच्चों को बेहतर शिक्षा मुहैया कराने के लिए।
आवास विकास परिषद के लोगों की मानें तो एक कालोनी विकसित करने के लिए 20-25 बीघा जमीन की आवश्यकता होती है। शहर में जमीन महंगी होने के कारण विभाग खरीदने में असमर्थ है। विभागीय लोगों का कहना है कि एक स्थान पर इतनी अधिक जमीन नहीं मिलने और विभागीय दर से अधिक मूल्य होने के कारण जमीन खरीदना संभव नहीं होता है। इससे नई कालोनी विकसित नहीं की जा रही है। विभागीय लोगों का भी मानना है कि किश्त पर आवास लेने वालों की संख्या अधिक है। कई इच्छुक लोगों ने कार्यालय पहुंचकर इस बाबत जानकारी भी हासिल की मगर, उनके हाथ निराशा ही लग रही है।