जिले में छोटे किसानों को स्थानीय स्तर पर ही उपज बेचने के लिए 179 सरसहॉट (मिनी मंडी) का निर्माण कराया गया। एक सरसहॉट के निर्माण पर तकरीबन 85 लाख रुपये खर्च हुए। किसानों को फसल बेचने के लिए पक्की दुकानें और टीनशेड का निर्माण हुआ, लेकिन किसानों को इसका रत्तीभर भी फायदा नहीं मिला। घटिया सामग्री से निर्मित दुकानें और टीनशेड टूट चुके हैं। कमीशनबाजी के खेल से तैयार अधिकांश सरसहॉट में एक भी दिन दुकानें नहीं लगीं। नतीजा यह कि किसान मजबूर होकर औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर हैं। हर चुनाव में नेता किसानों पर लंबे-चौड़े भाषण देते रहे, लेकिन इस समस्या की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। सरसहॉट खत्म होने से किसानों को हो रही परेशानी का जिक्र कर रहे हैं
गांव में बाजार को दिया जाना था बढ़ावा
जिले के किसानों को अपने उत्पाद बेचने के लिए बाहर न जाना पड़े, बल्कि थोक विक्रेता सीधे मिनी मंडी में आकर किसानों को वाजिब दाम देकर उनका उत्पाद खरीदें, इसी उद्देश्य से गांव-गांव के बाजारों में सरसहॉट का निर्माण किया गया था। मगर इसके निर्माण में इस कदर अनियमितता हुई कि बनने के साथ ही यह खत्म होते चले गए। वर्ष 1999 से 2002 के मध्य जिले में 179 सरसहॉट का निर्माण कराया गया था। एक सरस हॉट के निर्माण पर 85 लाख के करीब धनराशि खर्च की गई थी। इस तरह से देखा जाए तो शासन ने करोड़ों रुपये फूंक दिए। बेहद जर्जर अवस्था में खड़े इन भवनों की मरम्मत के लिए कोई पहल इसलिए नहीं हो रही है कि यह योजना भी बंद हो चुकी है। एसजीएस योजना के तहत बनने वाले यह बाजार वर्तमान में पूरी तरह उपेक्षित हैं।
अनाज के साथ सब्जी बेचने की थी तैयारी
जिले के किसान प्रति वर्ष 59,242 मीट्रिकटन धान, 44,000 मीट्रिक टन गेहूं, 26,451 मीट्रिक अरहर, 14,123 मीट्रिक टन चना, 11,452 मीट्रिकटन मटर की बिक्री करते हैं। अनाज को मिनी मंडी में ही बेचने की योजना के साथ ही बड़ी तादाद में नकदी फसल के रूप में सब्जी की खेती करने वाले किसानों को घर के करीब ही उचित दाम दिलाने की योजना थी, मगर यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सरस हॉट के फेल होने से किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर गया।
निर्माण में खूब चली थी कमीशनबाजी
सरस हॉट के निर्माण की जिम्मेदारी शासन स्तर पर ही एक फर्म को दे दी गई थी। कार्यदायी संस्था ने जिले के अधिकारियों की अनदेखी करते हुए मनमाने ढंग से निर्माण कराया। जब हैंडओवर करने की बात आई तो विभागीय अफसरों की खोज होने लगी। इससे अफसरों ने सहयोग नहीं किया और अधिकांश समर हॉट चार-चार साल तक हैंडओवर होने के चक्कर में लटके रहे। हालांकि बाद में प्रशासनिक अफसरों का दबाव बढने पर बाजार लगाने का प्रयास तेज किया गया, मगर कुछ ही दिनों में सब खत्म हो गया।
अनुपयोगी स्थलों पर करा दिया गया निर्माण
सरसहॉट का निर्माण अधिकांश स्थानों पर अनुपयोगी जगह पर करा दिया गया। जिसका परिणाम रहा कि स्थानीय किसानों को वहां तक पहुंचने में असुविधा का सामना करना पड़ा और बाजार नहीं लग सका।
छत कभी भी हो सकते हैं जमीदोंज
लगभग 18 साल पहले निर्मित इन सरसहॉट की दीवारें इतनी जर्जर हो गई हैं कि किसी भी समय गिर सकती हैं। सरसहॉट के निर्माण में इतनी कमीशनबाजी हुई कि जगेशरगंज और किठावर बाजार में बने बाजार पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं। गिरने के भय से व्यापारी भी इन बाजारों में बैठने से कतराते हैं।
पानी, बिजली की नहीं है कोई व्यवस्था
जिले में सरसहॉट की स्थापना तो की गई, मगर पानी और बिजली का प्रबंध नहीं किया गया। छाया का इंतजाम नहीं होने से व्यापारी और किसान इन बाजारों में अपना उत्पाद बेचने से कतरा रहे हैं।
किसानों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी योजना
किसानों के उत्पाद को उचित मूल्य दिलाने के लिए लागू की गई यह योजना पूरी तरह फेल हो गई। अफसरों की लापरवाही का आलम यह रहा कि उन्होंने कभी भी इस योजना की समीक्षा नहीं की। जिसका परिणाम रहा कि तीन साल में ही योजना खत्म हो गई। घटिया सामग्री से निर्मित दुकानें समय से ही पहले ही जवाब दे गईं।
उड़ गए टीनशेड, टूट गई फर्श
सरसहॉट के टीनशेड हवा में उड़ गए तो फर्श जगह-जगह उखड़ गई है। इससे बरसात के दिनों में बैठना मुश्किल हो जाता है। तेज हवाओं के चलने से टीनशेड को रोकने की पहल नहीं की जाती है। इससे दिन प्रतिदिन इनकी हालत खराब होती जा रही है।
आम, आंवला की भी लगनी है मंडी
सरसहॉट में किसानों के मुख्य उत्पाद आम और आंवले की भी मंडी सजनी थी, मगर तीन साल में ही यह योजना ध्वस्त हो गई। इससे जिले के किसानों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ। सरसहॉट का निर्माण होने से किसानों को आस जगी थी कि उनके दिन जल्द बहुरने वाले हैं, मगर कुछ ही दिन में उनकी उम्मीदें धूमिल हो गईं। हालत की देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस योजना में अफसरों ने कितना बंदरबांट किया था।
किसानों ने बयां किया दर्द
किसानों का कद बढ़ाने के लिए सरस हॉट का निर्माण तो कराया गया, मगर अफसरों की लापरवाही और कार्यदायी संस्थाओं के बंदरबांट के चलते योजना पूरी तरह फेल हो गई। जो भवन बने थे, वह इतने घटिया थे कि टिक नहीं पाए। अगर यह योजना सफल होती तो किसानों के दिन बहुर गए होते।
अमरबहादुर सिंह, रानीगंज
किसानों के हित की अनदेखी करके सरसहॉट का निर्माण कराया गया। मुख्य बाजार से दूर स्थित बाजार भवन में न तो कभी दुकानें लगीं और न ही कोई व्यापारी बाहर से उत्पाद खरीदने आया। हां इतना जरूर रहा कि कार्यदायी संस्था ने अपनी जेब भरने में कोई संकोच नहीं किया।
रामनाथ वर्मा, उसरी
किसानों के द्वार पर उचित मूल्य दिलाने के उद्देश्य से सरसहॉट का निर्माण किया गया था। मगर विभागीय अफसरों की लापरवाही के चलते यह योजना दम तोड़ गई। 85 लाख रुपये की लागत से निर्मित सरसहॉट की गुणवत्ता का ख्याल रखा जाता तो यह योजना बहुत ही कल्याणकारी सिद्ध होती।
रामकृष्ण, जगेशरगंज
किसानों के लिए सरसहॉट योजना बहुत ही कल्याणकारी योजना थी। मगर यह दुर्भाग्य ही रहा कि यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी। योजना पूरी तरह किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए थी, मगर अफसरों की अनदेखी के चलते सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह गई।
धनंजय प्रताप सिंह, बहुचरा