प्रतापगढ़। केसरवानी विद्यापीठ जबलपुर (मप्र) से बीएड की डिग्री लेकर प्रदेश भर के इंटर कालेजों में तैनात सैकड़ों शिक्षकों की नौकरी खतरे में पड़ गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने इन शिक्षकों की याचिका खारिज करते हुए संस्थान को फर्जी तथा डिग्री को अयोग्य करार दिया है। कोर्ट के इस फैसले से शिक्षा विभाग में भूचाल सा आ गया है।
केसरवानी विद्यापीठ से बीएड की डिग्री लेकर प्रदेश के राजकीय और सहायता प्राप्त इंटर कालेजों में तैनात सैकड़ों शिक्षकों की धड़कने बढ़ गई हैं। उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने शिक्षकों की उस दलील को खारिज कर दिया है जिसमें संस्थान के फर्जी होने की दशा में स्वयं को पाक-साफ बताया था। न्यायमूर्ति सत्येंद्र सिंह चौहान ने प्रदेश के लगभग दर्जन भर शिक्षकों की दलील को खारिज करते हुए कहा कि जब संस्थान ही फर्जी है तो डिग्री लेने वाले शिक्षक कहां से योग्य होंगे। कोर्ट का यह फैसला 31 मई को ही आ गया था, मगर ग्रीष्मावकाश के कारण शिक्षकों को जानकारी नहीं हो पाई थी।
बता दें कि जिले के राय बद्रीपाल सिंह इंटर कालेज बीरापुर में तैनात शिक्षक धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने कोर्ट को यह जानकारी देकर चौंका दिया था कि केसरवानी विद्यापीठ जबलपुर से बीएड की डिग्री लेने वाले वह अकेले नहीं हैं बल्कि प्रदेश में सैकड़ों लोग हैं। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश पर शासन ने मामले की जांच कराई। जांच में संस्थान के फर्जी मिलने पर संबंधित शिक्षकों और कालेज प्रबंधकों के खिलाफ थाने में प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई। न्यायालय ने शिक्षकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के आदेश पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि शिक्षकों ने नियुक्ति पाते समय कोई जानकारी या दस्तावेज छिपाया नहीं था। यह डीआईओएस की जिम्मेदारी थी कि उनकी डिग्री की वैधता की छानबीन करने के बाद ही नियुक्ति देते। संयुक्त शिक्षा निदेशक इलाहाबाद ओपी द्विवेदी ने बताया कि उन्हें हाईकोर्ट के आदेश की जानकारी नहीं है। फिलहाल यह मामला प्रदेश शासन के संज्ञान में है। इस संबंध में कार्रवाई भी शासन स्तर से ही होगी।