प्रतापगढ़। जिले में मनरेगा कमाई का जरिया बन चुकी है। योजना की तिजोरी में दिनदहाड़े डाका डाला जा रहा है। लघु सिंचाई विभाग में करीब 29 लाख के घपले का मामला सामने आया है। ऐसा करने वालों पर कार्रवाई के बजाय अफसर उन्हें बचाने में जुटे हैं। जांच, एफआईआर जैसी कार्रवाई के बजाय किश्तों में रकम की रिकवरी का आदेश डीएम ने दिया है। यह मामला आरटीआई (जन सूचना अधिकार) के तहत जानकारी मांगने पर सामने आ गया। वित्तीय अनियमितता जैसे मामलों की इस तरह उपेक्षा लोगों के गले नहीं उतर रही।
जनता विकास मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी तेज बहादुर सिंह ने आरटीआई के तहत एक सूचना मांगी थी। जिसमें लघु सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता शलभ श्रीवास्तव के जरिए 28 लाख 76 हजार तीन सौ रुपए के घपले का प्रकरण प्रकाश में आया। हालांकि इस मामले में अब तक जांच या एफआईआर जैसी कार्रवाई नहीं की गई है। डीएम ने घपला करने वालों से रकम की वसूली का आदेश जारी किया है। उन्होंने कहा था कि यह धनराशि शीघ्र खाते में डलवाई जाए। मगर अब तक डीएम के आदेश पर अमल नहीं हो सका है। घपले के दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के बजाय अधिकारी उन्हें बचाने में जुटे हैं। नियम के विपरीत जिम्मेदार लोगों ने बगैर अनुमोदन के मनरेगा की धनराशि को खर्च कर दिया है। यह मनरेगा गाइड लाइन के खिलाफ है। उन्होंने मामले की रिपोर्ट दर्ज कर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। वहीं लघु सिंचाई विभाग के सहायक अभियंता शलभ श्रीवास्तव कहते हैं कि उन पर लगे सारे आरोप गलत हैं। पैसे का घपला नहीं हुआ है। वहीं यदि दी गई सूचना के आधार पर यह स्थितियां खुलेआम मनरेगा के धन में लूट की दशा को उजागर कर रही हैं।
परियोजना निदेशक एसएन चौधरी का कहना है कि ऐसा नहीं कि उस पैसे का घोटाला किया गया है। यह सच है कि बगैर अनुमोदन हुए उन्होंने दूसरी जगह उतने पैसे से काम करा दिया है। प्रशासन खुद मामले में अपने स्तर से कार्रवाई कर रहा है।
वहीं इस मामले में अधिवक्ता विवेक उपाध्याय का कहना है कि यदि रिकवरी के आदेश हैं तो जाहिर हैं कि आरोप साबित हैं। बगैर आरोप साबित हुए रिकवरी के आदेश नहीं हो सकते। घपले का प्रकरण है फ्राड कहलाता है। ऐसी दशा में एफआईआर और जांच जरूरी है।